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अश्विनी वैष्णव को रेल मंत्री पद से इस्तीफा देना चाहिए या नहीं?

 

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देखा जाये तो रेल मंत्री पद से अश्विनी वैष्णव का इस्तीफा मांगा जा रहा है तो इसमें कुछ गलत नहीं है क्योंकि बात सिर्फ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हुए हादसे की ही नहीं है। आप रेलवे को समग्र रूप में देखेंगे तो पाएंगे कि कोई बड़ा सुधार कर पाने में अश्विनी वैष्णव पूरी तरह विफल रहे हैं...

नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ में 18 लोगों की मौत ही बड़ी खबर नहीं है। बड़ी खबर यह भी है कि रेलवे ने पिछले हादसों से कोई सबक नहीं सीखा है। बड़ी खबर यह भी है कि लोग यह समझ चुके हैं कि रेलवे में सुधार की बातें सिर्फ खोखली हैं। बड़ी खबर यह भी है कि तमाम लोगों को इस बात का पक्का विश्वास हो चला है कि पर्वों-त्योहारों और छुट्टियों के समय टिकट खरीदने से लेकर अपने गंतव्य तक पहुँचने तक रेल का सफर परेशान करेगा ही करेगा। बड़ी खबर यह भी है कि रेलवे स्टेशन पर या पटरी पर चलती ट्रेन के साथ कितनी बड़ी दुर्घटना हो जाये, रेल मंत्री कभी नैतिक जिम्मेदारी नहीं लेंगे। बड़ी खबर यह भी है कि दुर्घटना होने पर मुआवजे या जांच का ऐलान तुरंत ही करने वाले रेल मंत्री अपना इस्तीफा देना तो दूर कभी इस्तीफे की पेशकश तक नहीं करेंगे।

देखा जाये तो रेल मंत्री पद से अश्विनी वैष्णव का इस्तीफा मांगा जा रहा है तो इसमें कुछ गलत नहीं है क्योंकि बात सिर्फ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हुए हादसे की ही नहीं है। आप रेलवे को समग्र रूप में देखेंगे तो पाएंगे कि कोई बड़ा सुधार कर पाने में अश्विनी वैष्णव पूरी तरह विफल रहे हैं। अगर महाकुंभ की ही बात कर लें तो भले रेल मंत्री ने प्रयागराज के लिए हजारों ट्रेनें चलाने के दावे किये हों लेकिन आप देशभर में सर्वे करा लें तो पाएंगे कि प्रयागराज के लिए ज्यादातर लोगों को ट्रेनों में टिकट मिले ही नहीं और जिनको टिकट मिले उनका सफर आरामदायक नहीं रहा। यही नहीं, हैरानी की बात यह भी रही कि प्रयागराज के लिए रेलवे की वेबसाइट और ऐप पर भले टिकट नहीं थे लेकिन मेकमाई ट्रिप जैसी ट्रैवल साइटों पर 500 रुपए की अतिरिक्ति फीस देकर उसी तारीख के रेलवे टिकट उपलब्ध थे। हम 2047 तक भारत को आत्मनिर्भर बनाने की बात कर रहे हैं लेकिन 2025 तक रेलवे को इतना भी आत्मनिर्भर नहीं बना पाये हैं कि उसकी ही वेबसाइट और ऐप पर सभी को कंफर्म टिकट मिल जायें। आज भी रेल यात्रियों को अपना टिकट कंफर्म कराने के लिए वीआईपी कोटा या रेलवे कोटा लगवाने के लिए नेताओं और अधिकारियों से मदद मांगनी पड़ती है जोकि शर्मनाक है।

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ की घटना के जांच के आदेश तो दे दिये गये हैं लेकिन सवाल उठता है कि पहले की घटनाओं की जांच रिपोर्टों का क्या हुआ? पिछली घटनाओं के लिए कौन लोग दोषी ठहराये गये, उन्हें कौन-सी कड़ी सजा हुई? क्या इसका विवरण कभी रेल मंत्री देश के सामने रखने का साहस जुटाएंगे? देखा जाये तो नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हुई भगदड़ की घटना का प्रमुख कारण था ऐन समय पर ट्रेनों के प्लेटफॉर्म का बदला जाना। यह ऐसी चूक है जिसकी वजह से पहले भी दुर्घटनाएं हुई हैं लेकिन रेलवे ने कभी सबक नहीं सीखा। जब रेलवे स्टेशन का प्रबंधन यह देख रहा था कि वहां भारी भीड़ उमड़ी हुई है तो प्लेटफॉर्म बदलने का फैसला टाल कर क्या घटना को रोका नहीं जा सकता था? 

बात सिर्फ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की भी नहीं है। देश के तमाम शहरों से इस प्रकार की खबरें सामने आ रही हैं कि प्रयागराज जाने वाली ट्रेनों में लोग भारी भीड़ की वजह से चढ़ नहीं पा रहे हैं। इस प्रकार के भी वीडियो वायरल हैं जिसमें देखा जा सकता है कि यात्री सिर्फ दरवाजों से ही नहीं बल्कि खिड़कियों से भी ट्रेन के भीतर जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर तमाम वायरल वीडियो में भी देखा जा सकता है कि लोग ट्रेनों में नहीं चढ़ पाने को लेकर तोड़फोड़ तक कर रहे हैं। जनता की यह नाराजगी साफ दर्शाती है कि महाकुंभ जैसे बड़े आयोजन को लेकर रेलवे की ओर से पर्याप्त तैयारियां नहीं की गयी थीं।

यही नहीं, हमने दुनिया के सबसे ऊँचे पुल पर ट्रेन दौड़ाने का कीर्तिमान तो अपने नाम कर लिया लेकिन जमीन पर बिछी पटरियों पर दौड़ती ट्रेन की 100 प्रतिशत सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पाये हैं। आये दिन होते रेल हादसे दर्शा रहे हैं कि संभवतः मंत्रीजी का पूरा ध्यान इस विभाग पर नहीं है। हाल के रेल हादसों में से अधिकांश के पीछे साजिश का एंगल सामने आया है। यदि ऐसा है तो यह भी सुरक्षा में एक बहुत बड़ी खामी है। यही नहीं, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ की घटना के दौरान कुली और प्लेटफॉर्म पर स्टॉल लगाने वाले ही यात्रियों के बचाव में उतरे। एक भी यात्री ने यह नहीं बताया कि रेलवे पुलिस ने किसी की मदद की हो या उसे बचाया हो। साथ ही, भगदड़ की घटना के तत्काल बाद जिस तरह प्रयागराज के लिए स्पेशल ट्रेनें चलाईं गयीं वह दिखाता है कि रेलवे के पास अतिरिक्त ट्रेनों की व्यवस्था थी। इसलिए सवाल उठता है कि भीड़ को देखते हुए उन स्पेशल ट्रेनों को पहले क्यों नहीं चलाया गया? रेलवे ने गत शनिवार को प्रयागराज के लिए स्पेशल वंदे भारत ट्रेनें चलाने की घोषणा की थी लेकिन साधारण ट्रेनों को क्यों नहीं चलाया गया? क्या ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि वंदे भारत जैसी महंगी ट्रेनों से रेलवे को ज्यादा आमदनी होती है और साधारण ट्रेनों को चलाने से ज्यादा लाभ नहीं होता? क्या रेलवे ने अब सिर्फ अपने लाभ के बारे में ही सोचना शुरू कर दिया है?

सवाल और भी कई हैं लेकिन उनके जवाब मिलने की संभावना कम ही है। वैसे यह भी एक तथ्य है कि भारतीय रेलवे भारी दबाव में है। रेलवे में सुधार की अत्यंत जरूरत है। रेलवे को ऐसे मंत्री की भी जरूरत है जिसके पास रेलवे के अलावा अन्य किसी मंत्रालय का कार्यभार नहीं हो ताकि वह रेलवे पर ही पूरी तरह से ध्यान दे पाये। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि अश्विनी वैष्णव उच्च शिक्षित, अनुभवी और ईमानदार व्यक्ति हैं लेकिन आंकड़े दर्शाते हैं कि उनकी यह योग्यताएं रेलवे के काम नहीं आ पा रही हैं। अश्विनी वैष्णव अक्सर रेलवे की सुनहरी तस्वीर के बारे में सोशल मीडिया पर पोस्ट डालते रहते हैं जबकि हकीकत उससे काफी अलग होती है। यही नहीं, आज भले नई दिल्ली रेलवे स्टेशन या देश के अन्य स्टेशनों पर सब कुछ व्यवस्थित दिखाई दे रहा हो लेकिन सवाल उठता है कि क्या ऐसी ही व्यवस्था जल्द ही आने वाली होली की छुट्टियों और उसके बाद गर्मी की छुट्टियों के दौरान भी दिखाई देगी? बहरहाल, देखना होगा कि भारतीय रेलवे का भविष्य कैसा रहता है? वैसे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर बिखरे हुए जूते-चप्पलों, टूटी हुई चूड़ियों, कपड़ों, बैंगों के दृश्य और जिन 18 परिवारों में मौत हुई है उनके घर में पसरे मातम का दृश्य हर किसी के मन में सिहरन पैदा कर गये हैं।

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