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नेहरू से बसाया, राजीव-लोंगोवाल समझौते ने उलझाया

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चंडीगढ़ पर अनुच्छेद 240 के सहारे क्या कोई बड़ा गेम करने वाले हैं मोदी-शाह?

नई दिल्ली। 16 अगस्त 1946 की एक तारीख हिन्दुस्तान की आजादी के इतिहास की ऐसी ही तारीख है जिसने बंटवारे की हकीकत पर मुहर लगा दी। जुलाई 1947 में जब भारत जैसे विशाल देश को दो हिस्सों में बांटा जाने लगा तो इंग्लैंड ने वकील सिरील रेडक्लिफ को ये जिम्मेदारी दी। जबकि इससे पहले उन्होंने ऐसा कोई काम किया ही नहीं था। आनन फानन में ब्रिटेन से बुलाए गए सिरील रेडक्लिफ से कहा गया था कि भारत के दो टुकड़े करने हैं। रेडक्लिफ न कभी भारत आए थे, न यहाँ की संस्कृति की समझ थी, बस भारत को बांटने का ज़िम्मा उन्हें सौंप दिया गया था। वो चाहते थे कि लाहौर को भारत के पास जाना चाहिए लेकिन उनके सामने एक मजबूरी आ गई। वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने जब रेडक्लिफ से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के हिस्से में कोई बड़ा शहर नहीं था। मैंने कोलकाता जैसे बड़े शहर को पहले ही भारत के लिए चुन लिया था। इसलिए लाहौर पाकिस्तान को दे दिया। भारत के हिस्से आए पंजाब से लाहौर छीन चुका था और अब सबसे बड़ी समस्या यह थी कि भारत के हिस्से आए पंजाब की राजधानी अब कौन सा शहर बनेगा क्योंकि पंजाब के पास ना तो कोई राजधानी थी और ना ही कोई दफ्तर या ठिकाना। ऊपर से बंटवारे के बाद शरणार्थियों का आना लगातार जारी था। साल 1947 से 51 के बीच करीब 75 लाख हिंदू और सिख पाकिस्तान से पंजाब की तरफ पलायन कर गए। इनके पास ना अपनी जमीन थी और ना ही कोई ठिकाना। ऐसे माहौल में भारत सरकार और नेहरू के सामने दो बड़ी चुनौतियां थी। पहली चुनौती थी पंजाब के किस शहर को उसकी राजधानी बनाया जाए और दूसरी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को कहां बसाया जाए। इन्हीं दो सवालों ने एक शहर को जन्म दिया जिसे सिटी ब्यूटीफुल चंडीगढ़ कहा जाता है। चंडीगढ़ को आर्टिकल 240 के दायरे में लाने की खबरों के बीच राजनीति गरमा गई है लेकिन गृह मंत्रालय ने आधिकारिक बयान जारी कर इस विवाद पर रोक लगाने की कोशिश की है। ऐसेपंजाच से छीनने की कोशिश करने का आरोप लगाया है। ऐसे में आइए जानते हैं कि क्या है चंडीगढ़ की पॉलिटिकल हिस्ट्री जिसमें पहले पंजाब और हरियाणा इस पर हक जताते थे। आखिर क्यों नेहरू से लेकर इंदिरा और फिर राजीव तक इस मसले को नहीं सुलझा सके। अब चंडीगढ़ किस वजह से चर्चा में है।

नेहरू ने बसाया

चंडीगढ़ शहर साल 1952 में पंडित जवाहरलाल नेहरू के दौर में बसाया गया था। उस वक्त पेप्सू स्टेट की राजधानी पटियाला हुआ करती थी, जबकि पूर्वी पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ को बनाया गया। साल 1956 में दोनों को मिलाकर पंजाब राज्य बना और साल 1966 तक चंडीगढ़ पंजाब की राजधानी थी। चंडीगढ़ को लेकर दावा उसी साल शुरू हुआ था, जब हरियाणा राज्य अस्तित्व में आया और पंजाब राज्य पुनर्गठन अधिनियम के तहत चंडीगढ़ को यूटी घोषित कर दिया गया।

अनुच्छेद 240 क्या है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 240 देश के राष्ट्रपति को ख़ासकर केंद्र शासित प्रदेशों में शांति, विकास और व्यवस्था सुनिश्चित करने का अधिकार देता है। यह अंडमान और निकोबार, लक्षद्वीप, दादरा और नगर हवेली, दमन और दीव के साथ ही पुडुचेरी जैसे अन्य बिना विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेशों पर लागू होता है। चंडीगढ़ का प्रशासन फ़िलहाल पंजाब के राज्यपाल के अधीन है। राज्यपाल राज्य के मंत्रिमंडल की सलाह पर काम करते हैं तो इस तरह से चंडीगढ़ से जुड़े मामलों पर पंजाब सरकार का परोक्ष दखल होता है। लेकिन अगर यह एलजी के अधीन आ गया तो यह आशंकाएं है कि यह अन्य केंद्र शासित प्रदेशों की तरह केंद्र के अधीन आ जाएगा।

राजीव-लोंगोवाल समझौता

साल 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और संत हरचरण सिंह लोंगोवाल के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत भी चंडीगढ़ पूरी तरह पंजाब को मिलना था और हरियाणा को अपनी अलग राजधानी बनानी थी। राजीव-लोंगोवाल समझौते में नई राजधानी और पानी के बंटवारे के साथ ही कुछ अन्य बातें भी थीं, जिसे पंजाब और हरियाणा में से किसी ने नहीं माना।

क्या है ताजा विवाद

दरअसल, विवाद तब बढ़ा जब संसद की बुलेटिन में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2025 का जिक्र सामने आया। इस बिल में चंडीगढ़ को आर्टिकल 240 में शामिल करने का प्रस्ताव था, जिससे राष्ट्रपति को चंडीगढ़ के लिए सीधे नियम बनाने का अधिकार मिल जाता। कई राजनीतिक दलों ने आशंका जताई कि इससे चंडीगढ़ का प्रशासन पंजाब के हाथों से निकलकर एक स्वतंत्र प्रशासक के हाथों में चला जाएगा। विवाद बढ़ता देख मंत्रालय ने स्पष्ट कहा कि केंद्र केवल चंडीगढ़ के लिए कानून बनाने की प्रक्रिया को आसान बनाने पर विचार कर रहा है। गृह मंत्रालय ने यह भी साफ किया कि इस प्रस्ताव से चंडीगढ़ की मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं होगा और न ही पंजाब या हरियाणा के पारंपरिक संबंधों पर कोई असर पड़ेगा। चंडीगढ़ से जुड़े बिल को लेकर जिस तरह माहौल गर्म हो गया और तुरंत गृह मंत्रालय की सफाई आई है उससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि केंद्र सरकार इस पर कदम फूंक फूंक कर रखेगी। 2027 में पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं। वहां बीजेपी की स्थिति पहले से ही अच्छी नहीं है। अकाली दल से अलग होने के बाद बीजेपी वहां अपना संगठन मजबूत करने की कोशिश कर रही है। लेकिन यहां उसे अकाली दल, आम आदमी पार्टी, कांग्रेस सबसे मुकाबला करना है।

क्यों अहम है मुद्दा?

चंडीगढ़ का मुद्दा पंजाब की अस्मिता से जुड़ा मुद्या है। इसे विपक्षी दल क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दे के तौर पर इस्तेमाल करेंगे तो पंजाब में बीजेपी की दिक्कत बढ़ सकती है। 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी यहां दो सीट ही जीत पाई थी और वोट शेयर करीब 6 पर्सेट रहा था। प्रस्तावित बिल का मुद्दा अगर आगे बढ़ता है तो विपक्षी दल बीजेपी की पंजाब विरोधी छवि बनाएंगे, जो उसे नुकसान पहुंचा सकती है। इस प्रस्तावित बिल को संसद के आने वाले शीतकालीन सत्र में पेश करने के लिए लिस्ट किया गया था। इस खबर के बाद, खासकर पंजाब के नेताओं ने इसका कड़ा विरोध किया और इसे पंजाब के अधिकारों पर हमला बताया।

विपक्ष ने लगाया चंडीगढ़ को छीनने का आरोप

कांग्रेस के सीनियर नेता जयराम रमेश ने इस घटनाक्रम पर केंद्र सरकार की कार्यशैली पर करारा हमला बोला। उन्होंने कहा कि संसद की बुलेटिन में अचानक बिल की एंट्री डाल दी गई, जिससे चंडीगढ़ के प्रशासनिक ढांचे में बदलाव की आशंका पैदा हुई, जबकि पंजाब लंबे समय से चंडीगढ़ को अपने अधिकार क्षेत्र से जुड़ा मानता है। आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल, शिअद नेता हरसिमरत कौर बादल और कांग्रेस नेता प्रताप सिंह बाजवा जैसे कई नेताओं ने रविवार को केंद्र सरकार की आलोचना की। इन्होंने केंद्र सरकार पर चंडीगढ़ को पंजाब से छीनने की कोशिश करने का आरोप लगाया है।

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