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नीतीश कुमार...डिप्टी पीएम मैटेरियल?

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नीतीश ने 20 साल तक बिना बहुमत मुख्यमंत्री रहते हुए अपनी चाणक्य नीति दिखाई। उनके दिल्ली जाने के फैसले और विधान परिषद छोड़ने के बाद बेटे निशांत के संभावित डिप्टी सीएम बनने के कयास हैं। हालांकि आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। नीतीश हमेशा पार्टी और कार्यकर्ताओं का संतुलन रखते हैं। अब निशांत की भूमिका और सरकार में उनका पद क्या रहता है, यह देखना दिलचस्प होगा। निशांत कुमार बहुत जल्द जेडीयू में औपचारिक रूप से शामिल हो सकते हैं और पार्टी की गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाते नजर आएंगे. अगले एक हफ्ते के अंदर निशांत जेडीयू में शामिल हो जाएंगे। जदयू की कमान निशांत को मिले, जदयू के बड़े हिस्से की यह पुरानी मांग है...

1977 की एक दोपहर थी। पटना का मशहूर इंडिया कॉफी हाउस हमेशा की तरह बहसों और चर्चाओं से गुलज़ार था। अलग-अलग टेबलों पर बैठे लोग राजनीति, समाज और देश के भविष्य पर तर्क-वितर्क कर रहे थे। उसी भीड़ में एक कोने की मेज पर दो नौजवान दोस्त भी बैठे थे। उनमें से एक अभी-अभी विधायक का चुनाव हार कर आया था। बहस तेज हो चुकी थी। तभी वह नौजवान अचानक गुस्से में मेज पर मुक्का मारता है और लगभग ऐलान करते हुए कहता है-देख लेना, एक दिन मैं बिहार का मुख्यमंत्री बनूंगा। सत्ता हासिल करूंगा, चाहे कुछ भी करना पड़े। लेकिन जब सत्ता मिलेगी तो काम भी अच्छा करूंगा। उस वक्त शायद किसी ने उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन ठीक 24 साल बाद, 3 मार्च 2000 को वही नौजवान बिहार के राज्यपाल के सामने शपथ लेते हुए कह रहा था-मैं नीतीश कुमार, श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से बिहार राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन करूंगा। यह कहानी उस नेता की है जो पिछले दो दशकों से बिहार की राजनीति के केंद्र में बना हुआ है। एक ऐसा नेता जिसके राजनीतिक पतन का मर्सिया कई बार पढ़ा गया, लेकिन हर बार वह फिर खड़ा हो गया। जो राजनीति की करवट बदलकर बड़े-बड़े नेताओं को चौंका देता है। यह उसी नेता की कहानी है जिसने अपने पहले दो विधानसभा चुनाव हारे, यहां तक कि एक समय राजनीति से संन्यास लेने का मन बना लिया। लेकिन फिर अचानक हालात बदले। उसने नई राजनीतिक राह चुनी, नई पार्टी बनाई और देखते ही देखते बिहार की सत्ता तक पहुंच गया। यह उस नेता की भी कहानी है जिसके पिता कांग्रेसी थे, लेकिन कांग्रेस ने उन्हें टिकट देने से इंकार कर दिया। पिता के उस अपमान ने बेटे को समाजवाद की राह पर डाल दिया, लोहिया का समाजवाद, जेपी का समाजवाद। वक्त बीतता गया और राजनीति करवट लेती रही। यही नेता एक समय गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी के साथ मंच साझा करने से इंकार कर देता है। उन्हें सांप्रदायिक करार देकर भाजपा से 17 साल पुरानी दोस्ती तोड़ देता है और अपने पुराने दोस्त, बाद के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी लालू यादव से हाथ मिला लेता है। लेकिन गठबंधन बदलते रहे, समीकरण बदलते रहे। नीतीश कुमार बिहार की सियासत के वो नेता हैं जिनके पास सियासी बंदूक तो खुद की होती है लेकिन विरोधी पर निशाना साधने के लिए चुनावी समर में कारतूस सहयोगी से लेते हैं। मतलब मौके की नजाकत को भांप कारतूस बदलने का विकल्प सदैव वो अपने हाथों में रखते हैं। मुख्यमंत्री की कुर्सी,  हर बार किसी न किसी तरह फिर नीतीश कुमार के पास ही लौट आती रही। जिससे  2007 में आई फिल्म पार्टनर जिसका एक दृश्य याद आ जाता है जब सलमान की बहन भास्कर यानी गोविंदा को कपड़ों की सेट दे रही होती है तो प्रेम यानी सलमान कहते हैं, ये मेरे कपड़े हैं इस भास्कर को कैसे फिट आएंगे। भास्कर यानी गोविंदा चेहरे पर मुस्कान लिए जवाब देते हैं डोंट वर्री फिट हो जाएंगे, अपना तो साइज ही इतना अजीब है कि किसी भी साइज के अंदर फिट हो जाता हूं। बिहार के मुख्यमंत्री को लेकर भी इन दिनों ऐसा ही कुछ ऐसा ही कहा जा सकता है। जब से उनके राज्यसभा जाने का ऐलान हुआ तमाम तरह की अटकलों ने जन्म लेना शुरू कर दिया है। 

नीतीश कुमार को लेकर या तो आप उनसे प्यार करते हैं या नफरत लेकिन उन्हें अनदेखा नहीं कर सकते। कुल मिलाकर पूरा लब्बोलुआब है कि हमेशा चर्चाओं में बने रहना। बिहार के मुख्यमंत्री, पीएम मैटेरियल वाले मुख्यमंत्री, सुशासन बाबू के उपनाम वाले मुख्यमंत्री, बिहार में बहार हो का नारा देने वाली पार्टी के मुख्यमंत्री इससे एक कदम आगे अब क्या उप प्रधानमंत्री मैटेरियल वाले मुख्यमंत्री बनने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं? बिहार सीएम की कुर्सी भाजपा के पास जा सकती है। नित्यानंद राय से लेकर सम्राट चौधरी और दलित सीएम जैसी थ्योरी सामने आ रही है। इसके साथ ही जेडीयू से दो डिप्टी सीएम वाली थ्योरी भी दी जाती है। अटकल या कयास हमेशा अधूरी जानकारी से बनते हैं। लेकिन राजनीति में तो जैसे अधूरी बात से भी पूरा मतलब निकालने की परंपरा है। संकेतों की राजनीति में किसी भी बयान या तस्वीरों को नरजअंदाज नहीं किया जाता। 

अंत भला तो सब भला 

अब आपको छोड़ा पीछे लिए चलते हैं। बिहार विधानसभा चुनाव का दौर नवंबर का महीने साल 2020 जब एक रैली में नीतीश कुमार ने कहा था आज चुनाव का आखिरी दिन है और परसों चुनाव है। ये मेरा अंतिम चुनाव है। अंत भला तो सब भला। अब आप बताइए कि वोट दीजिएगा न इनको? हाथ उठाकर बताइए। हम इनको (उम्मीदवार को) जीत की माला समर्पित कर दें?”  तब किसी ने भी नहीं सोचा था कि नीतीश कुमार के इस बयान का मतलब इतना आगे निकल जाएगा कि अभी साल बरस बीता ही था नई नवेले सरकार और 2025 से 2030 बिहार में फिर से नीतीश के नारे के सहारे फिर से सत्ता में आने के बाद जेडीयू-बीजेपी की सरकार का प्राइम फेस बदल जाएगा। सवाल तो ये भी उठ रहा है कि क्या बिहार की राजनीति से नीतीश का मन भर गया। 

कई बार झुकाव से उन्नति का रास्ता खुलता है

अब आपको एक तस्वरी दिखाते हैं- बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। इस तस्वीर में नीतीश के बॉडी लैंग्वेज का बड़ा फर्क है जिसकी तरफ आलोचकों ने ध्यान दिलाया। 90 डिग्री के कोण से घूमते हुए शरीर का झुकाव 60 डिग्री पर पहुंच गया। गणित के नियम में भले ही कोण का घिरना झुकाव दर्शाता हो लेकिन राजनीति में विज्ञान दूसरा है। कई बार झुकाव से उन्नति का रास्ता खुलता है। वैसे ये भी कहा गया सब सम्मान की बात है। लेकिन इसके दूसरे मायने भी तलाशे जा रहे हैं।

मोदी ने नीतीश के लिए क्या प्लान किया हुआ है? 

जब राष्ट्रपति चुनाव के पहले नाम आया तो चुप्पी साधे रहे। जब उप राष्ट्रपति बनाने की बात आई तो तैयार नहीं हुए। अब 20 साल बिहार के मुख्यमंत्री रहने के बाद नीतीश राज्यसभा सांसद बनने को तैयार हो गए। कई विश्लेषक दावा कर रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी के भारी दबाव के बाद वह 37 साल पुराने रास्ते पर लौटने को तैयार हुए हैं। ऐसे में क्या देश की नरेंद्र मोदी सरकार में उन्हें कोई बड़ा ओहदा मिलने जा रहा है या सिर्फ सांसद बनकर वह राजनीति की अंतिम पारी खेलने के लिए उतरे हैं?  राज्यसभा सांसद बनकर रिटायर होना तो उनकी इच्छा में नहीं ही हो शायद। नीतीश ने अप्रत्याशित फैसला लिया है तो क्या आगे कुछ उन्हें आश्चर्यजनक तौर पर मिल सकता है? अटकलें तो इस बात की भी हैं कि  उन्हें उप प्रधानमंत्री जैसा कुछ बनाया जाए तो बहुत आश्चर्यजनक नहीं होगा। वह अटल बिहार वाजपेयी की सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं और केंद्र की मौजूदा सरकार के लगभग सभी मंत्रियों से सीनियर हैं।

बिहार की राजनीति के टीना फैक्टर हैं नीतीश

बिहार की राजनीति में तीन मुख्य राजनीतिक दल ही सबसे ताकतवर माने जाते हैं। इन तीनों में से दो का मिल जाना जीत की गारंटी माना जाता है। बिहार की राजनीति में अकेले दम पर बहुमत लाना अब टेढ़ी खीर है। नीतीश कुमार को ये तो मालूम है ही कि बगैर बैसाखी के चुनावों में उनके लिए दो कदम बढ़ाने भी भारी पड़ेंगे। बैसाखी भी कोई मामूली नहीं बल्कि इतनी मजबूत होनी चाहिये तो साथ में तो पूरी ताकत से डटी ही रहे, विरोधी पक्ष की ताकत पर भी बीस पड़े। अगर वो बीजेपी को बैसाखी बनाते हैं और विरोध में खड़े लालू परिवार पर भारी पड़ते हैं और अगर लालू यादव के साथ मैदान में उतरते हैं तो बीजेपी की ताकत हवा हवाई कर देते हैं। 

निशांत क्या करेंगे

नीतीश ने 20 साल तक बिना बहुमत मुख्यमंत्री रहते हुए अपनी चाणक्य नीति दिखाई। उनके दिल्ली जाने के फैसले और विधान परिषद छोड़ने के बाद बेटे निशांत के संभावित डिप्टी सीएम बनने के कयास हैं। हालांकि आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। नीतीश हमेशा पार्टी और कार्यकर्ताओं का संतुलन रखते हैं। अब निशांत की भूमिका और सरकार में उनका पद क्या रहता है, यह देखना दिलचस्प होगा। निशांत कुमार बहुत जल्द जेडीयू में औपचारिक रूप से शामिल हो सकते हैं और पार्टी की गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाते नजर आएंगे. अगले एक हफ्ते के अंदर निशांत जेडीयू में शामिल हो जाएंगे। जदयू की कमान निशांत को मिले, जदयू के बड़े हिस्से की यह पुरानी मांग है। 

अगले सीएम का नाम नीतीश की विदाई से ज्यादा चौंकाएगा

नीतीश नफा- नुकसान दोनों को बखूबी भांप लेते हैं। वहीं बीजेपी की रणनीति संयमित और दीर्घकालिक होती है। जेडीयू में फिलहाल कोई मजबूत मुख्यमंत्री उम्मीदवार नहीं है और निशांत भी बिना विधान परिषद या विधानसभा सदस्य बने सीएम नहीं बन सकते। राजीव गांधी, हेमंत सोरेन और राबड़ी देवी जैसे कई उदाहरण हैं, जो इतिहास में राजनीति में अप्रत्याशित रहे हैं। अब कयास है कि बीजेपी पिछड़ा वर्ग से सीएम् चेहरा पेश कर सकती है। इनमें सम्राट चौधरी, दिलीप जायसवाल और नित्यानंद राय का नाम है। हालांकि, फैसला पीएम नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को ही करना है। 

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