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उच्च वेतन का आधार कार्यभार ग्रहण कर लेना ही नहीं हो सकतारू हाई कोर्ट

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प्रयागराज (राजेश सिंह)। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि रिक्ति के अधियाचन की सूचना नहीं दी गई और पद दो माह तक खाली नहीं रहा, फिर भी नियुक्ति की गई है तो ऐसे तदर्थ प्रिंसिपल या हेड मास्टर को उस पद का वेतन नहीं मिलेगा। हालांकि यदि वेतन दे दिया गया है तो उसकी वसूली नहीं की जाएगी, लेकिन आगे से वेतन नहीं दिया जाएगा। जिला विद्यालय निरीक्षक ऐसे मामलों में जांच कर चार सप्ताह में कार्यवाही करें।

न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकलपीठ ने बुलंदशहर की समिता तथा 10 अन्य याचिकाओं में शामिल 19 याचीगण की याचिकाओं को निस्तारित करते हुए यह आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा, उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड अधिनियम, 2023 और उसके नियमों के तहत तदर्थ प्रिंसिपल या हेड मास्टर की नियुक्ति का प्रावधान नहीं है। अधिनियम 1921 और उसके नियमों के तहत भी याचीगण को तदर्थ प्रिंसिपल का वेतन देने का कोई प्रावधान नहीं है।

प्रश्न यह था कि क्या उत्तर प्रदेश इंटरमीडिएट एजुकेशन एक्ट, 1921 और उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड एक्ट, 1982 के तहत याचीगण को तदर्थ प्रिंसिपल या हेड मास्टर का वेतन मिलेगा अथवा उन्हें अधिनियम 1982 की धारा 18 के तहत पूर्व शर्तों को पूरा करना होगा?

कोर्ट ने इस बात पर भी विचार किया क्या इलाहाबाद हाई कोर्ट के ही धनेस्वर सिंह चौहान बनाम डीआइओएस बदायूं-1980, नर्वदेश्वर मिश्रा बनाम डीआइओएस देवरिया- 1982 और सोलोमन मोरार झा बनाम डीआइओएस देवरिया मामले में दिए गए निर्णयों का डॉ. जय प्रकाश नारायण सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य मामले में पूर्ण बेंच के निर्णय में विचार किया गया है और क्या यह निर्णय वर्तमान मामले पर लागू होता है?

याचीगण के अधिवक्ताओं का तर्क था कि यदि प्रिंसिपल या हेड मास्टर के पद पर अस्थायी रिक्त में तदर्थ पदोन्नति की जाती है तो पदोन्नत व्यक्ति प्रिंसिपल या हेड मास्टर के वेतन का हकदार होगा। सरकार की तरफ से कहा गया कि 1980, 1982 और 1985 के निर्णय पुराने हैं और अधिनियम 1982 की धारा 18 को 2001 में संशोधित किया गया था।

कोर्ट ने पाया कि 1980, 1982 और 1985 के निर्णय मुख्य रूप से 18 जनवरी 1974 के सरकारी आदेश पर आधारित थे, जिसमें कहा गया था कि प्रिंसिपल पद पर कार्यरत शिक्षक को प्रिंसिपल ग्रेड का वेतन मिलेगा। साथ ही 1982 के निर्णय में उस परंतुक का भी उल्लेख किया गया था, जिसमें कहा गया था कि यदि हेड ऑफ इंस्टीट्यूशन के पद पर अस्थायी रिक्त 180 दिनों से अधिक समय तक रहती है तो सबसे वरिष्ठ योग्य शिक्षक को प्रिंसिपल के रूप में पदोन्नत किया जा सकता है और उसे पद का वेतन मिलेगा।

कोर्ट ने उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड नियम, 1998 के नियम और इसके उस स्पष्टीकरण को भी देखा, जिसमें कहा गया है कि ‘वरिष्ठ शिक्षक’ का अर्थ है संस्थान में उच्चतम ग्रेड के पद पर वरिष्ठ शिक्षक। इस शब्द का आशय प्रिंसिपल के पद के ग्रेड से नहीं है।

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