राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देश की प्रगति में सभी नागरिकों के योगदान पर बल दिया। उन्होंने भारत की मजबूत अंतरराष्ट्रीय स्थिति और 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य का उल्लेख किया। हालांकि, उन्होंने नौकरशाही में भ्रष्टाचार, प्रदूषण, शिक्षा की गुणवत्ता और शहरी ढांचे जैसी बाधाओं को दूर करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया, ताकि यह स्वप्न साकार हो सके...
गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने अनेक स्वतंत्रता सेनानियों का स्मरण करते हुए जिस तरह यह कहा कि सभी भारतवासी जीवंत गणतंत्र को शक्तिशाली बना रहे हैं, उसका सीधा संदेश यही है कि देश की प्रगति में हर किसी का योगदान होता है। यह उनके संबोधन से तब स्पष्ट भी हुआ, जब उन्होंने सेनाओं के साथ अर्धसैनिक बलों एवं पुलिस के जवानों से लेकर स्वास्थ्यकर्मियों, शिक्षकों, विज्ञानियों, इंजीनियरों समेत किसानों, सफाईमित्रों आदि का उल्लेख किया।
निश्चित रूप से किसी भी देश के विकास में उसके सभी नागरिकों का योगदान आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है। भारत ने गणतंत्र के रूप में पिछले 76 वर्षों में जो भी प्रगति की है, उसके लिए सभी को गर्व होना चाहिए। यह एक तथ्य है कि तमाम समस्याओं और चुनौतियों के बावजूद भारत ने एक ओर जहां स्वयं को एक सफल गणतंत्र सिद्ध किया है, वहीं दूसरी ओर विश्व के प्रमुख राष्ट्र के रूप में भी उभारा है। आज अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत की स्थिति कहीं अधिक सुदृढ़ है। इसी सुदृढ़ता के कारण 2047 तक देश को विकसित राष्ट्र बनाने का स्वप्न देखा जा रहा है।
इस स्वप्न को साकार करने के लिए संकल्पित होने का यह सही समय है। यह संतोष का विषय तो है कि देश सही दिशा में बढ़ता हुआ दिखने के साथ विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां भी प्राप्त कर रहा है, लेकिन इसे लेकर सजग रहने की भी आवश्यकता है कि विकसित भारत के लक्ष्य को पाने के लिए अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति कैसे हो, इसकी चिंता शासन-प्रशासन के लोगों के साथ आम जनता को भी करनी होगी।
यह स्वाभाविक है कि शासन एवं प्रशासन की ओर से देश को आगे ले जाने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में जो कदम उठाए जा रहे हैं, उनका राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में विस्तार से उल्लेख किया, लेकिन इसके बाद भी यह नहीं कहा जा सकता कि देश एकजुट होकर उस लक्ष्य को पाने के लिए संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है, जिसकी चर्चा प्रधानमंत्री की ओर से बार-बार की जा रही है। यदि देश को वास्तव में 2047 तक विकसित राष्ट्र बनना है तो सरकारी कामकाज के तौर-तरीकों में मूलभूत परिवर्तन लाना आवश्यक है।
यह ठीक नहीं कि जिन समस्याओं से हमें अब तक मुक्ति पा लेनी चाहिए, वे पीछा नहीं छोड़ रही हैं। यह आभास गहराई से किया जाना चाहिए कि नौकरशाही का भ्रष्टाचार, वायु एवं जल प्रदूषण में वृद्धि, शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर उठते प्रश्न और शहरी ढांचे में अपेक्षित सुधार के अभाव आदि ने हमारी प्रगति को बाधित कर रखा है। यह समझा जाना चाहिए कि इन बाधाओं को दूर करके ही विकसित देश के सपने को साकार किया जा सकता है।
