प्रयागराज (राजेश सिंह)। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि लंबे समय तक बिना किसी प्रतिरोध शारीरिक संबंध बनाए रखना अपराध नहीं माना जा सकता। यदि मान भी लें कि प्रारंभ में शादी का झूठा वादा किया गया था तो भी नौ वर्षों तक संबंध बनाए रखना पीड़िता के तर्क को अविश्वसनीय बनाता है कि उसकी सहमति भ्रांति से थी।
इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने शादी का झांसा दे दुष्कर्म केस में अभियुक्त सिपाही जितेंद्र कुमार व उसके भाई-भाभी को बड़ी राहत दी है। कहा है कि कोई ठोस साक्ष्य नहीं है। न्यायमूर्ति अवनीश कुमार सक्सेना ने याचिका स्वीकार कर चार्जशीट व अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एक) द्वारा पारित समन आदेश रद कर दिया है।
अलीगढ़ के गांधी पार्क थाने में बीएनएस की धारा 69 व 351(2) के तहत प्राथमिकी दर्ज हुई थी। याची के अधिवक्ता ने कहा कि धारा 180 व 183 बीएनएसएस के तहत दर्ज पीड़िता का बयान असंगत है। वह वकील है। अपने कृत्य का परिणाम जानती थी।
उसने एफआइआर दर्ज कराने से पहले अभियुक्त से 10 लाख मांगे व रकम न मिलने पर देरी से झूठी एफआइआर दर्ज करा दी। बचाव पक्ष ने महेश दामू खरे बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य (2024) प्रमोद सूर्यभान पवार बनाम महाराष्ट्र राज्य (2019) व प्रशांत बनाम एनसीटी दिल्ली राज्य (2025) में सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का उल्लेख किया।
