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सनातन के गुप्त साधक थे नेताजी सुभाष चन्‍द्र बोस

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस की सनातन हिंदू धर्म में गहरी आस्था थी। वे देवी-देवताओं की पूजा पद्धति और धार्मिक रीति-रिवाजों में विश्वास रखते थे। उनके स्वतंत्रता संघर्ष पर भी हिंदू धार्मिकता का प्रभाव स्पष्ट था। मांडले जेल में दुर्गा पूजा के अधिकार के लिए उन्होंने भूख हड़ताल भी की। नेताजी हिंदुत्व और भारतीयता को एक मानते थे, और उनकी बेटी ने भी उन्हें नास्तिक मानने से इनकार किया है...

भारतीय सांस्‍कृतिक एवं धार्मिक अवधारणाओं पर नेताजी सुभाष चन्‍द्र बोस की गहरी आस्‍था थी। सनातन हिन्‍दू देवी-देवता पूजा पद्धति एवं धार्मिक रीति-रिवाजों पर उनका विश्‍वास था। उनके स्‍वतंत्रता संघर्ष एवं राजनीतिक अवधारणाओं पर भी हिन्‍दू धार्मिकता का प्रभाव स्‍पष्‍ट रूप से परिलक्षित होता है। हिन्‍दू सनातनी परिवार में जन्‍म लेने के कारण नेताजी सुभाष चन्‍द्र बोस हमेशा हिन्‍दू धार्मिक संस्‍कारों से ओत-प्रोत रहे। नेताजी ने अत्‍यंत विश्‍वासपूर्वक कहा कि हिन्‍दूत्‍व और भारतीयता, दोनों एक ही तत्‍व है।

नेताजी ने प्रेसिडेंसी कॉलेज में अपना नामांकन करवाया। उनकी मित्र-मंडली में कई ऐसे लोग थे जो स्‍वयं को रामकृष्‍ण परमहंस और स्‍वामी विवेकानन्‍द का आध्‍यात्मिक उत्तराधिकारी मानते थे। नेताजी ने स्‍वयं लिखा कि कॉलेज आने के प्रथम दो वर्षों तक वे इन लोगों के प्रभाव में आकर बौद्धिक और नैतिक दृष्टि से प्रखरता प्राप्‍त कर रहे थे। उपदेशों के अतिरिक्‍त ये लोग सामाजिक सेवा को ही आध्‍यात्मिक विकास मानते थे। परन्‍तु नेताजी की दृष्टि में समाज सेवा का अर्थ स्‍कूल और अस्‍पताल का निर्माण तक ही सीमित नहीं था अपितु शैक्षणिक क्षेत्र में राष्‍ट्रीयता का विकास भी था।

कॉलेज दिनों में नेताजी सार्वजनिक दूर्गा पूजा आयोजन में बहुत दिलचस्‍पी रखते थे। वर्मा के मांडले जेल से 26 दिसम्‍बर, 1925 को अपनी भाभी को भेजे एक पत्र में नेताजी के धार्मिक और आध्‍यात्मिक अवधारणाओं की स्‍पष्‍ट झलक मिलती है। पत्र में उन्‍होंने लिखा कि मुझे यह नहीं पता कि हमलोग कब तक जेल में रखे जाएंगे। लेकिन यदि साल में एक बार मां दुर्गा की पूजा और दर्शन का सौभाग्‍य मिल जाता है तो जेल काटना आसान हो जाता है। नेताजी ने लिखा कि दुर्गा माता में हमें मां और मातृभूमि के दर्शन होते हैं।

16 अक्‍टूबर, 1926 को अपने बड़े भाई को मां दुर्गा की पूजा का महत्‍व बताते हुए नेताजी ने पत्र में लिखा कि इससे हमें सात्विक एवं आध्‍यात्मिक सौंदर्य, बौद्धिक मनोरंजन और स्‍थायी धार्मिक सांत्‍वना भी मिलती है। नेताजी ने लिखा कि आज विजया दशमी है और आज बंगाल में लोग अपने संबंधी, मित्र और यहां तक कि अपने शत्रुओं को भी प्रेम से गले लगाते होंगे। अपने मित्र दिलीप कुमार राय को नेताजी ने 5 मार्च, 1933 को चिट्ठी लिखा कि मैं शिव, काली और कृष्‍ण भक्ति के द्वंद्व में उलझा हुआ हूं। मैं यह मानता हूं कि ईश्‍वर एक है लेकिन ईश्‍वरीय पूजन विधि एवं परम्‍परा में भिन्‍नता भी है।

उन्‍होंने लिखा कि शिव और शक्ति की आस्‍था के बीच झूल रहा हूं क्‍योंकि शिव आदि योगी हैं और काली जगन्‍माता हैं। नेताजी ने आगे लिखा कि पिछले चार-पांच वर्षों से मैं मंत्रशक्ति पर अत्‍यधिक विश्‍वास करने लगा हूं। मैंने अनुभव किया है कि मंत्रोच्‍चार में कुछ अलग शक्ति है और इससे एकाग्रता प्राप्‍त करने में सहायता मिलती है। उन्‍होंने आगे लिखा कि खास मंत्र के लगातार उच्‍चारण से मस्तिष्‍क के खास भाग ऊर्जान्वित होते हैं। लेकिन मेरा झुकाव कभी शाक्‍त, कभी वैष्‍णव के प्रति बदलते रहने के कारण मैं मंत्रशक्ति का पूरा लाभ नहीं ले पाता हूं।

अक्‍टूबर, 2025 में नेताजी मांडले जेल में बंद थे और उसी समय दूर्गा पूजा होनेवाली थी। नेताजी ने जेल अधीक्षक मेजर फिंडले को आवेदन दिया कि उन्‍हें सनातनी ढंग से दुर्गा पूजा आयोजित करने की अनुमति दी जाए और इसके लिए निधि भी उपलब्‍ध कराई जाए। उन्‍होंने स्‍पष्‍ट किया कि भारत के जेलों में बंद ईसाई कैदियों को सरकार द्वारा ऐसी सुविधा दी जाती है। अधीक्षक ने नेताजी का अनुरोध स्‍वीकार कर लिया, जबकि अभी सरकार की अनुमति नहीं मिली थी।

कुछ दिनों बाद सरकार ने जेल अधीक्षक के अनुरोध को नामंजूर ही नहीं किया बल्कि अधीक्षक को इसके लिए दंडित भी किया गया कि उन्‍होंने नेताजी के अनुरोध पर विचार क्‍यों किया। नेताजी ने पुनरू आवेदन दिया कि यदि उन्‍हें जेल के अंदर दुर्गा पूजा करने की अनुमति और सहयोग नहीं दिया जाएगा तो वे जेल के भीतर भूख-हड़ताल पर चले जाएंगे। सरकार अपनी जिद अड़ी रही और नेताजी ने भी जेल के अंदर ही भूख हड़ताल शुरू कर दिया। यह उदाहरण सिद्ध करता है कि नेताजी ने हिन्‍दूत्‍व और पूजा पद्धति को न सिर्फ व्‍यक्तिगत आस्‍था बल्कि राजनीतिक उपकरण के रूप में भी प्रयोग किया।

अपनी पूरी जिंदगी में नेताजी ने हिन्‍दूत्‍व से संबंधित धार्मिक आचरणों पर विश्‍वास किया। इतना ही नहीं, आई.एन.ए. से जुड़े लोगों की अपनी धार्मिक मान्‍यताओं एवं विश्‍वासों के अभ्‍यास पर कभी प्रतिबंध नहीं लगाया। नेताजी की आत्‍मकथा में लियोनार्ड गॉर्डन सिंगापुर के स्‍वामी स्थितानन्‍द और स्‍वामी सिद्धांतानन्‍द को उधृत करते हुए लिखते हैं कि नेताजी नॉरिस रोड के रामकृष्‍ण मिशन आश्रम में जाकर घंटों योगाभ्‍यास में बैठे रहते थे। द्वितीय विश्‍व युद्धकाल में एक ओर बर्लिन पर बमबाजी होती रहती थी और इधर नेताजी अपने घर में देर रात्रि तक योगाभ्‍यास करते रहते थे।

सिंगापुर पर जापानी कब्‍जा होने के बाद भी नेताजी ने रामकृष्‍ण सोसाइटी के साधु की संगत में रहकर धार्मिक शिक्षा एवं योगाभ्‍यास करते रहे थे। नेताजी को पूर्णतरू धार्मिक हिन्‍दू माननेवाली उनकी बेटी अनीता ने नेताजी के 125वें जन्‍मदिन पर आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि नेताजी को नास्तिक मानना गलत है। धर्म, मातृभूमि, स्‍वतंत्रता संघर्ष एवं भारतीयता को समेकित करते हुए नेताजी ने लिखा था कि आप भारत के किसी भी भाग में चले जाएं, पूजा विधि, पद्धति, श्‍लोक, धार्मिक आचरण एवं परम्‍परा आदि समान ही मिलते हैं।

उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूरब से लेकर पश्चिम तक भारत में रहनेवाले सभी हिन्‍दू भारत को अपनी पवित्र भूमि मानते हैं। यहां की पवित्र नदियों में उनकी गहरी आस्‍था है और यह भावना संपूर्ण भारत में एक समान ढंग से पाई जाती है। कई लोगों ने भ्रामक उल्‍लेख किया है कि नेताजी नास्तिक थे। यद्यपि नेताजी ने कभी धार्मिक व्‍याख्‍यान नहीं दिया तथापि उनमें भारतीयता और हिन्‍दूत्‍व के अवयव कूट-कूट कर भरे हुए थे। भारत की स्‍वाधीनता आंदोलन के साथ राष्‍ट्रीयता एवं हिन्‍दू धर्म को जोड़ने का सफल प्रयास स्‍वामी विवेकानन्‍द, बाल गंगाधर तिलक और अरविन्‍दो घोष कर चुके थे।

1932 ई. में स्‍वास्‍थ्‍य जांच के लिए नेताजी वियना गए थे। वहां उनकी मुलाकात विट्ठल भाई पटेल से हुई। दोनों नेताओं के बीच हुई लम्‍बे विमर्श के बाद यह निष्‍कर्ष आया कि भारतीय स्‍वतंत्रता संग्राम में सफलता के लिए यह आवश्‍यक है कि अन्‍य देशों के स्‍वतंत्रता संघर्ष के साथ इसे जोड़ा जाए। यह भी तय हुआ कि विश्‍व के प्रमुख देशों की राजनीतिक वैचारिक मुद्दों के साथ भारत की स्‍वतंत्रता को शामिल किया जाना जरूरी है ताकि ब्रिटेन अपनी विदेश नीति पर दबाव महसूस करे।

गांधीजी के राजनीतिक दृष्टि में यह उदारता नहीं थी क्‍योंकि 1920 ई. में हुई नागपुर कांग्रेस अधिवेशन के बाद लंदन में खोले गए कांग्रेस के छोटे कार्यालय को भी उन्‍होंने बंद करवा दिया था। इस कार्यालय द्वारा प्रकाशित पर्चों के माध्‍यम से इंग्‍लैंड एवं अन्‍य देशों के बुद्धिजीवियों तक भारत की वास्‍तविक स्थिति की जानकारी आसानी से दी जा रही थी। भारत में कार्यरत न्‍यूज एजेंसियों पर इंग्‍लैंड सरकार के कड़े नियंत्रण के बाद अमेरिका के कुछ पत्रकारों ने भारत भ्रमण कर यहां की स्थिति के बारे में तथ्‍य प्रकाशित किए।

लेकिन इस विषय पर सबसे अधिक प्रकाश ‘हर्स्‍ट’ अखबार के कार्ल हेनरी वॉन विगेंड के आलेखों में होता है। बाध्‍य होकर अंग्रेजी सरकार ने बहुत अधिक आर्थिक प्रोत्‍साहन देकर कैथरिन मेयो नामक अमेरिकन लेखक से ‘मदर इंडिया’ नामक किताब प्रकाशित करवाया जिसमें भारतीय स्‍वतंत्रता संग्राम के प्रमुख आंदोलनकारियों की छवि धूमिल की गई थी। इस प्रकरण में उल्‍लेखनीय है कि भारत के स्‍वतंत्रता आंदोलनकारियों द्वारा ऐसा कोई तंत्र विकसित नहीं किया गया जिसके माध्‍यम से भारत की वास्‍तविक स्थिति के बारे में विश्‍व जनमत को अवगत कराकर ध्‍यान आकृष्‍ट किया जा सके।

एक बारीक अन्‍तर यह दिखता है कि जहां अन्‍य लोग अपनी धार्मिक मान्‍यता को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करते हैं, नेताजी इसे व्‍यक्तिगत भाव ही मानते रहे हैं। यही कारण है कि कई अध्‍येताओं ने नेताजी को वामपंथी समाजवादी विचारधाराओं से प्रभावित ठहराने का असफल प्रयास भी किया है। श्री अरविन्‍दो के भाई बारीन्‍द्र कुमार घोष को लिखे हस्‍तलिखित पत्र का संदर्भ देते हुए सुमेरू राय चौधरी ने अर्थ लगाया है कि नेताजी वर्ग संघर्ष के समर्थक थे।

अहिंसा के माध्‍यम से भारत को आजाद करा लिए जाने के गांधीजी के सिद्धांत नेताजी सुभाष चन्‍द्र बोस एवं उनकी उम्र की नई पीढ़ी के छात्रों एवं नौजवानों को संतुष्‍ट नहीं कर पा रहा था। आई.सी.एस. की प्रारंभिक परीक्षा में उत्‍कृष्‍ट अंक प्राप्‍त करने के बाद भी नेताजी ने भारत की स्‍वतंत्रता को प्राथमिकता दिया।

भाषा एवं भारतीय दर्शनशास्‍त्र के अध्‍ययन में गहन अभिरुचि रखनेवाले नेताजी ने 16 फरवरी, 1921 को चितरंजन दास को पत्र लिखा कि कांग्रेस को स्‍थायी कार्यालय, शोध करनेवाले विशेषज्ञ एवं भारत के प्रत्‍येक व्‍यक्ति से संबंधित आंकड़ा संधारित करना चाहिए। उन्‍होंने कांग्रेस कार्यालय में खुफिया विभाग एवं प्रचार विभाग की स्‍थापना पर भी बल दिया ताकि भारत की नीति निर्धारण में वैज्ञानिकता आ सके। नेताजी की सोच थी कि स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत की सरकार के सम्‍मुख नीति निर्धारण की बड़ी चुनौती होगी।

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