प्रयागराज (राजेश सिंह)। महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर संगम नगरी का मिजाज पूरी तरह ‘शिवमय’ हो गया है। आध्यात्म और उल्लास का अनूठा संगम लोकनाथ क्षेत्र में देखने को मिल रहा है, जहां की ऐतिहासिक शिव बारात का इंतजार लोग पूरे साल करते हैं।
गली-गली में गूंजा ‘बम-बम’ का जयघोष
सुबह से ही लोकनाथ और चौक की गलियां केसरिया रंग और अबीर-गुलाल से सराबोर नजर आईं। ‘बम-बम भोले’ के जयघोष के बीच प्रसिद्ध शिव बारात की शुरुआत ‘बाबा लोकनाथ’ के विशेष श्रृंगार से हुई। यह सिर्फ एक जुलूस नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का उत्सव है, जहां हर वर्ग और हर समुदाय का व्यक्ति शिवगण बनकर शामिल होता है।
बारात का मुख्य आकर्षण वे युवा रहे, जिन्होंने खुद को भस्म से ढककर, गले में कृत्रिम सांपों की माला पहनकर और जटाएं फैलाकर शिवगण का स्वरूप धारण किया। देव, दनुज, दानव और किन्नर रूपों में सजे कलाकारों ने ढोल-ताशों की थाप पर अद्भुत नृत्य और करतब दिखाए। कोई मुंह से आग निकालता दिखा तो कहीं नरमुंडों की माला पहने मां काली का स्वरूप आकर्षण का केंद्र बना।
काशी सा ठाठ, कैलाश सा दृश्य
कहा जाता है कि यह बारात काशी विश्वनाथ मंदिर की परंपरा का प्रतिरूप है। नंदी पर सवार बाबा की झांकी और पीछे चलते भूत-प्रेत व देवी-देवताओं के स्वरूपों ने पूरे क्षेत्र को ‘छोटा कैलाश’ का रूप दे दिया। इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए सड़कों पर भारी भीड़ उमड़ी रही।
ठंडई, प्रसाद और पुष्प वर्षा
लोकनाथ की प्रसिद्ध दुकानों पर भांग मिश्रित ठंडई का दौर चरम पर रहा। श्रद्धालु ‘प्रसादम’ ग्रहण कर आस्था में सराबोर दिखे। वहीं पुराने शहर की छतों से महिलाओं और बच्चों ने बारातियों पर पुष्प वर्षा कर स्वागत किया। पूरा इलाका मानो एक विशाल मंडप में तब्दील हो गया।
श्रद्धा और मस्ती का अनूठा संगम
इस बारात की खासियत ‘अक्खड़पन’ और ‘अध्यात्म’ का संगम है। जहां एक ओर मंत्रोच्चार की गंभीरता है, वहीं दूसरी ओर लोकधुनों पर झूमते लोग हैं। यह परंपरा दर्शाती है कि भगवान शिव केवल वैरागी ही नहीं, बल्कि जन-जन के उत्सव के देव भी हैं।
