प्रयागराज में सजी फागुनी महफ़िल, मूर्खानन्द-बेवकूफ़ानन्द ने की मस्ती
प्रयागराज। लिटरेरी क्लब (इलाहाबादी साहित्यिक अड्डा) एवं साहित्यांजलि प्रज्योदि के संयुक्त तत्त्वावधान में फागुनी महफिल जमी।
ठेठ इलाहाबादी अंदाज में हंसी-ठिठोली, गीत-गवनई के साथ फूल और गुलाल से होली खेली गई। सूफ़ी परंपरा का निर्वहन करने वाले शायर अनवार अब्बास नकवी ने मूर्खानन्द की पदवी स्वीकारते हुए अध्यक्षता की। लंठाधिराज डॉ. प्रदीप चित्रांशी मुख्य अतिथि रहे। बेवकूफ़ानन्द आकाशवाणी के पूर्व निदेशक लोकेश शुक्ल रहे। फागुनी क्वीन संगीता श्रीवास्तव ने संचालन किया। शुरुआत लोकेश शुक्ल ने गणेश स्तुति और सरस्वती वन्दना से की।
रंगों की अपनी अनूठी ऊर्जा
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे अनवार अब्बास ने कहा कि होली में रंग मात्र खेलने के लिए नहीं बल्कि उसकी आध्यात्मिकता को महसूस करने की जरूरत है क्योंकि हर रंग की अपनी अनूठी ऊर्जा होती है जो हमारी भावनाओं के साथ-साथ निर्णय लेने की क्षमता को भी प्रभावित करती है। काशी, मथुरा-वृन्दावन से इतर इलाहाबाद की होली ‘सहनशीलता' का पाठ पढ़ाती है।
गुझिया की कथा सुनाई
डॉ प्रदीप चित्रांशी ने गुझिया की कथा सुनाते हुए कहा कि होली में पापड़, कचरी, सेव के साथ गुझिया जिसे संस्कृत में ‘करणिका' कहते हैं। यह एक ऐसी मिठाई है जिसने अहंकार को समाप्त करने के लिए अपने अंदर मावा शक्कर मेवा के सम्मिश्रण को समेट कर,खोलते हुए घी में डुबकी लगाई। उसकी सोंधी महक को ग्रहण कर मिठास कि वह धारा बन गई जिससे वशीभूत होकर दोस्त छोड़िए दुश्मन भी गले मिलने लगे।
दुनिया में इकलौता ऐसा त्योहार है, जिसमें हर रंग और व्यंजन की अपनी निज पहचान है तथा ‘संवाद में मिठास' हो सिखाती है। डॉ० राहुल शुक्ल ‘साहिल’ ने रंगों के वैज्ञानिक एवं चिकित्सकीय महत्व पर अपने विचार साझा किए, जिसे सभी ने अत्यंत उपयोगी बताया।
इलाहाबादी होली' के परिपेक्ष्य में रंजन पाण्येय ने रंगों के विभिन्न आयामों पर बेहतरीन शब्द चित्र खींचे। साकिब सिद्दीकी ‘बादल' ने एक-दूसरे पर पुष्प वर्षा करते हुए इलाहाबादी अन्दाज में गुलाल लगाया गया तथा आभार व्यक्त किया।
