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10 लाख लोग रोज सुबह 4 बजे स्नान कर रहे

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माघ मेले में कल्पवासियों पर ठंड का असर नहीं

प्रयागराज (राजेश सिंह)। इस वक्त दिन में सबसे ज्यादा ठंड तड़के 4 से 6 बजे के बीच लगती है। उसी वक्त प्रयागराज माघ मेले में करीब 10 लाख लोग गंगा में डुबकी लगाते हैं। यह कोई एक दिन नहीं ,बल्कि पूरे एक महीने करते हैं। स्नान के बाद वापस आते हैं और भक्ति में लीन हो जाते हैं। दिन में एक समय सात्विक भोजन करते हैं। कहते हैं- जो सुख इसमें है वह कहीं नहीं। यहां से जाने के बाद इंतजार करते हैं कि कब फिर से मौका आए।

कल्पवासी पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक संगम के किनारे रहते हैं। इनका पूरा शेड्यूल आम दिनों से एकदम बदला हुआ होता है। 

10 लाख कल्पवासी माघ मेले में तपस्या कर रहे

धार्मिक नगरी प्रयागराज में पौष पूर्णिमा के साथ ही माघ मेला शुरू हो गया। इसी दिन से कल्पवास भी शुरू हो जाता है। वेद-पुराण में जिक्र है कि इस एक महीने देवी-देवता प्रयागराज में ही वास करते हैं। इसलिए उनकी प्रार्थना करने और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए करीब 10 लाख लोग यहीं संगम की रेती में बस जाते हैं। पूरे एक महीने अध्यात्म में खो जाते हैं। 800 हेक्टेयर में बसे इस मेले में आधे से ज्यादा हिस्से पर कल्पवासियों के ही टेंट नजर आते हैं।

पिछली बार महाकुंभ था, भीड़ ज्यादा थी। इसलिए कल्पवासियों को संगम के आसपास नहीं बसाया गया था। लेकिन, इस साल संगम और आसपास के क्षेत्र में भी कल्पवासियों के टेंट लगाए गए हैं। संगम से करीब 300 मीटर दूर कल्पवासियों के टेंट में हम गए। वहां महिलाएं एक ही टेंट में बैठकर भजन-कीर्तन करती नजर आईं। जितने भी टेंट बने थे, सभी के सामने तुलसी का पौधा लगा था। घर से लाए जौ को उगाने के लिए जमीन तैयार की गई थी।

उर्मिला के ही साथ कौशिल्या भी आई हैं। वह कहती हैं- यह एक अलग दुनिया है, हम सभी यहां मिलकर रहते हैं। बहुत अच्छा लगता है। सब अपनी कहानियां, किस्से सुनाते हैं। कुल मिलाकर यहां आत्मा को सुकून मिलता है। पास बैठी शशिकला भी कौशल्या के हां में हां मिलाते हुए कहती हैं- हम तीसरे साल आए हैं, यहां बहुत अच्छा लगता है।

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शकुंतला कहती हैं- हम 2 साल से आ रहे हैं। यहां वही लोग आते हैं, जो अपने बीत चुके जीवन से संतुष्ट होते हैं। हम सबको तो इतना अच्छा लगता है कि जब यहां से जाते हैं तो फिर इस इंतजार में रहते हैं कि आगे कब माघ महीना आए और हम फिर से संगम की इस धरती पर वापस आएं।

एक टेंट में हमें साधु का वेष बनाए रामेश्वर दास मिले। रामेश्वर दास का रीवा में होटल का कारोबार है। वह कहते हैं- मेरी मां 1972 से ही कल्पवास करने आती रही हैं। उस वक्त हम लोग आते और कुछ दिन रहते थे। मां का निधन हो गया तो हम सबने उनका अच्छे से अंतिम संस्कार किया। फिर सोचने लगे कि कभी हम भी कल्पवास शुरू करेंगे। अब गुरुजी की कृपा से हमें यह मौका मिला है। हम यहां आ रहे हैं।

हर व्यक्ति अलग-अलग दिनों में पाठ करता है

हम संगम के किनारे से निकलकर सेक्टर- 4 की तरफ बढ़े। हर तरफ कल्पवासियों के टेंट नजर आए। यहीं एक टेंट से रामायण के पाठ की आवाज आई। हम अंदर पहुंचे तो देखा एक महिला कल्पवासी रामायण का पाठ कर रही हैं। इस दौरान कोई भी उनसे बात नहीं करता।

सुबह 5 से 9 बजे तक और शाम को 4 से रात 8 बजे तक वह लगातार पाठ करती हैं। लोग हर दिन के हिसाब से बांटे हुए हैं। अगले एक महीने तक ऐसे ही लगातार चलता रहेगा।

कल्पवास के इसी कैंप में शीतला प्रसाद पटेल रहते हैं। वह कहते हैं- रामायण पाठ का यह क्रम लगातार चलता रहता है। हम सभी सुबह गंगा स्नान करके लौटते हैं और फिर यह शुरू होता है। दोपहर में सभी लोग एक वक्त का भोजन करते हैं। उस भोजन में भी किसी तरह का मसाले का प्रयोग नहीं करते। कभी रोटी-सब्जी, तो कभी दाल-चावल खाते हैं। शाम को हमारे यहां से कोई भी स्नान करने नहीं जाता।

ब्रह्मचर्य पालन करना, एक समय भोजन और कथा सुनना

माघ मेले में कल्पवासियों से बात करने के बाद पता चलता है कि इसके कुछ नियम हैं। जैसे इस पूरे एक महीने ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। दिन में किसी भी समय एक बार भोजन करना होता है। हर दिन पूजा-पाठ और कथा सुनना है। जिन आश्रमों में कथा की व्यवस्था नहीं थी, वहां के लोग दूसरी जगहों पर जाकर कथा सुनते दिखाई दिए।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एक कल्पवासी 12 साल तक लगातार कल्पवास करता है। ज्यादातर लोग इसे एक कुंभ से शुरू करते हैं, फिर दूसरे कुंभ में खत्म करते हैं। कहा जाता है कि 12 साल की इस तपस्या के बाद मोक्ष मिलता है।

कर्मकांड और पूजा में हर कार्य संकल्प के साथ शुरू होता है। संकल्प में श्श्रीश्वेतवाराहकल्पेश् का संबोधन किया जाता है। इसका हिंदी मतलब होता है कि सृष्टि की शुरुआत से लेकर अब तक 11 कल्प बीत चुके हैं। अभी 12वां कल्प चल रहा है।

कल्पवास को लेकर कहानियां क्या हैं?

कल्पवास करके लौटे याज्ञवल्क्य का पैर भारद्वाज मुनि ने पकड़ा कल्पवास को लेकर अलग-अलग कहानियां प्रचलित हैं। रामचरित मानस में भारद्वाज मुनि से जुड़ी एक कहानी है। माघ महीने में साधु-संत प्रयागराज आए और भारद्वाज मुनि के आश्रम में रहकर कल्पवास करने लगे।

कल्पवास पूरा करने के बाद जब लौट रहे थे, तब याज्ञवल्क्य मुनि का पैर भारद्वाज मुनि से पकड़ लिया। रामकथा सुनाने का आग्रह किया। इसके बाद याज्ञवल्क्य मुनि ने उन्हें रामकथा सुनाई। कहा जाता है कि राम वनवास की शुरुआत में प्रयाग गए। फिर लंका विजय हासिल करने के बाद वापस प्रयागराज लौटे और स्नान-दान किया।

शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के मुताबिक, ब्रह्माजी के एक दिन को एक कल्प कहा गया। कलयुग, द्वापर, त्रेता और सतयुग चारों युग को मिलकर जब एक हजार बार आते हैं, तो वह अवधि ब्रह्माजी के एक दिन के बराबर होती है।

सतयुग 17,28,000 साल, त्रेता युग 12,96,000 साल, द्वापर युग 8,64,000 साल और कलियुग 4,32,000 साल का होता है। ऐसे एक हजार साल बीतेंगे, तब एक कल्प होगा। यानी कोई कुंभ में कल्पवास करेगा, तो पृथ्वी की गणना के अनुसार उसे 432 करोड़ साल का फल मिलेगा।

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