Ads Area

Aaradhya beauty parlour Publish Your Ad Here Shambhavi Mobile Aaradhya beauty parlour

विवाद बढ़ाने का काम करता चीन

sv news


आज भारत के एकमात्र भरोसेमंद दोस्त रूस ने खुद को यूक्रेन के साथ अपने अंतहीन युद्ध में उलझा लिया है और इस कारण काफी कमजोर हो चुका है। चीन-विरोध के नाम पर भारत की मदद का फैसला कर सकने वाला अमेरिका भी इस समय दुनिया भर के साथ आर्थिक टकराव में बुरी तरह उलझा हुआ है...

 जब अमेरिका भारत के समक्ष समस्याएं खड़ी करने से बाज नहीं आ रहा है, तब चीन भी चिंता का कारण बन रहा है। वास्तव में चीन ने जबसे 1951 में तिब्बत पर जबरन कब्जा करके भारत-तिब्बत सीमा को भारत-चीन सीमा में बदल दिया, तबसे उसके भारत-विरोधी रुख में लगातार वृद्धि होती चली जा रही है। पहले तो उसने 1962 में तिब्बत को छावनी की तरह इस्तेमाल करके भारत पर हमला किया। इसके बाद से वह सैकड़ों किलोमीटर लंबी इस सीमा पर उकसावे की कोई न कोई हरकत करता आ रहा है।

आर्थिक और सैनिक शक्ति हासिल करने के बाद तो चीन की यह आक्रामकता सीधी दादागीरी में बदल चुकी है। पहले वह भारत के अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख के इलाकों पर जुबानी दावे करता था, लेकिन 2017 में डोकलाम घाटी पर कब्जे की कोशिश में मुंह की खाने के बाद उसने पूरी सीमा पर बड़े पैमाने पर सैन्य निर्माण शुरू करके भारत के लिए नई चिंताएं पैदा कर दी हैं। पिछले दिनों अंतरिक्ष से सीमाओं की टोह लेने वाले भारतीय उपग्रहों से पता चला कि लद्दाख में चीनी कब्जे वाले शक्सगाम इलाके में चीनी सेना एक ऐसी सड़क बना रही है, जो भारत-पाकिस्तान और चीन के इस मिलन क्षेत्र में सियाचिन की सुरक्षा के लिए नए खतरे पैदा कर सकती है।

शक्सगाम घाटी जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के भारत में विलय के बाद भारत का हिस्सा थी, लेकिन अक्टूबर 1947 में उस पर हमले में पाकिस्तानी सेना ने कब्जा कर लिया था। 1962 के भारत-चीन युद्ध के एक साल बाद ही पाकिस्तान ने चीन को खुश करने के लिए 1963 की एक संधि के तहत शक्सगाम का लगभग 5,180 वर्ग किमी क्षेत्र चीन को सौंप दिया। रणनीतिक दृष्टि से शक्सगाम के भौगोलिक महत्व को इससे समझा जा सकता है कि यह पाकिस्तान द्वारा भारत से छीने गए गिलगित-बाल्टिस्तान और चीन द्वारा 1949 में कब्जाए गए ईस्ट-तुर्किस्तान (चीन द्वारा दिया गया नया नाम ‘शिनजियांग’) को आपस में जोड़ता है।

इसके अलावा यह सियाचिन के बहुत निकट है जो शक्सगाम और भारत के उस अक्साई चिन को अलग करता है, जिस पर 1950 के दशक में चीन ने गुपचुप कब्जा कर लिया था। शक्सगाम में चीन की यह नई सड़क बन जाने के बाद दुनिया के सबसे ठंडे युद्धक्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर को पाकिस्तानी हमलों से बचाने में जुटी भारतीय सेनाओं के लिए खतरा दोगुना हो जाएगा। आज सियाचिन पर उपस्थिति के कारण भारतीय सेना चीन के सैनिक महत्व वाले कराकोरम हाईवे पर नजर रख सकती है, जिसकी वजह से सियाचिन चीन के आंख की किरकिरी बना हुआ है। इसी क्षेत्र पर कब्जे के लिए 2021 में चीनी सेना ने गलवन में धोखे से हमला किया था।

दुनिया के सबसे कठिन इलाकों में गिने जाने वाले इस क्षेत्र में सड़कों के सैनिक महत्व को इससे समझा जा सकता है कि गलवन कांड के तुरंत बाद भारतीय सेना ने जिस गति और संख्या के साथ चीनी सैनिकों पर जवाबी हमला करके चीन को झकझोर दिया, वह केवल इसलिए संभव हो पाया कि उससे पहले ही भारतीय सेनाओं को लेह और श्योक से गलवन होते हुए दौलतबेग ओल्डी तक पक्की सड़क मिल चुकी थी। मोदी सरकार को इसका श्रेय जाता है कि उसने भारत-तिब्बत सीमा पर लगने वाली लगभग हर चौकी को 70 से ज्यादा नई और बारहमासी सड़कों से जोड़ दिया है।

जैसी उम्मीद थी, सैटेलाइट चित्रों के बाद भारत सरकार ने चीन के समक्ष विरोध दर्ज किया है। न केवल विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता, बल्कि थलसेना अध्यक्ष ने भी चीन को याद दिलाया है कि शक्सगाम घाटी एक भारतीय क्षेत्र है और उसे चीन को सौंपने वाला 1963 का पाकिस्तान-चीन समझौता गैरकानूनी और अस्वीकार्य है। चीन ने अपने परंपरागत अक्खड़ अंदाज में इस विरोध को अस्वीकार करते हुए इसे दो सार्वभौम देशों के बीच हुआ समझौता बताने का प्रयास किया, लेकिन यह कहते हुए चीनी प्रवक्ता ने इस तथ्य को छिपा लिया कि उस समझौते में साफ-साफ लिखा है कि शक्सगाम भारत और पाकिस्तान के बीच एक विवादित इलाका है और भविष्य में इस विवाद के सुलझने पर इस इलाके के अधिकार वाली सरकार से नया समझौता किया जाएगा।

शक्सगाम घाटी को लेकर विवाद के बीच सवाल यह है कि चीन ने नई सड़क बनाकर भारत के साथ नया विवाद शुरू करने का फैसला करने के लिए यही समय क्यों चुना? इसे समझने के लिए चीनी रणनीति और इतिहास पर एक नजर डालना काफी होगा। 1912 में स्वतंत्र चीनी गणराज्य की स्थापना के बाद चीन ने तिब्बत, दक्षिणी मंगोलिया और मंचूरिया पर कब्जा करके जिन 14 देशों के साथ सीमाएं साझा की हैं, उनमें से 12 में से अधिकांश के साथ उसने सीमा समझौते ऐसे मौकों पर किए, जब वे किसी न किसी कारण से कमजोर थे और चीन के दबाव में थे, लेकिन भारत और भूटान के साथ उसने सीमा समझौते इस कारण टाले हुए हैं कि धीरे-धीरे लक्षित इलाकों में उनकी जमीन हड़पने के बाद ही और ‘उचित’ अवसर आने पर ही वह ये समझौते करेगा।

चीन ने एशिया में हर बड़ी सैन्य कार्रवाई के लिए ऐसे समय का चुनाव किया, जब बड़ी शक्तियां किसी बड़े विवाद में उलझी हुई थीं। उदाहरण के लिए तिब्बत पर कब्जा जमाने के लिए उसने मुख्य सैनिक हमला तब किया जब उसने सोवियत संघ के साथ मिलकर उत्तरी कोरिया और दक्षिणी कोरिया के बीच युद्ध शुरू करके अमेरिका को उस झगड़े में उलझा दिया। इसके बाद 1962 में उसने अक्टूबर में भारत पर तब हमला किया, जब क्यूबा में सोवियत संघ और अमेरिका के बीच परमाणु हथियारों की तैनाती को लेकर पूरी दुनिया का ध्यान इस तनाव पर टिका हुआ था।

आज भारत के एकमात्र भरोसेमंद दोस्त रूस ने खुद को यूक्रेन के साथ अपने अंतहीन युद्ध में उलझा लिया है और इस कारण काफी कमजोर हो चुका है। चीन-विरोध के नाम पर भारत की मदद का फैसला कर सकने वाला अमेरिका भी इस समय दुनिया भर के साथ आर्थिक टकराव में बुरी तरह उलझा हुआ है। ऐसे में भारत के लिए चीन की ओर से किसी अनुचित कार्रवाई का खतरा पहले से अधिक है। शक्सगाम में चीन का नया कदम एक ऐसी चेतावनी है, जिस पर भारत को पूरी तरह चौकस रहने की आवश्यकता है। उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

Top Post Ad