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न्याय की प्रतीक्षा में कश्मीरी हिंदु

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कश्मीरी हिंदुओं की अनदेखी एक के बाद एक सरकारों ने तो की ही, सुप्रीम कोर्ट ने भी की। उसने कश्मीर में उनकी सुनियोजित हत्या के मामलों की जांच कराने से यह कहकर मना कर दिया कि अब बहुत देर हो चुकी है। इस कथन ने न्याय में देर के साथ अंधेर को ही चरितार्थ किया...

जनवरी की 19 तारीख आई और चली गई, लेकिन विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं की ओर मुश्किल से ही किसी का ध्यान गया। हां, फारूक अब्दुल्ला ने यह कहकर उनके जख्मों पर नमक अवश्य छिड़का कि आखिर कश्मीरी हिंदुओं को अपने घरों को लौटने से किसने रोका है? उनकी मानें तो कश्मीरी हिंदू जब चाहें, तब घाटी लौट सकते हैं और आराम से अपने घरों में रह सकते हैं, पर यह सच नहीं। कश्मीर का माहौल अभी ऐसा नहीं कि कश्मीरी हिंदू बिना किसी भय-आशंका के अपने घरों को लौट सकें। 19 जनवरी, 1990 को कश्मीरी हिंदुओं के पलायन दिवस के तौर पर जाना जाता है।

वैसे तो कश्मीर से कश्मीरी हिंदुओं का पलायन 1990 के पहले ही शुरू हो गया था, लेकिन इस वर्ष की 19 जनवरी वह तिथि थी, जब उनका सामूहिक तौर पर बड़ी संख्या में पलायन हुआ। 36 वर्ष बीत गए हैं, लेकिन उनके अपने घरों को लौटने की कोई सूरत नहीं और अब तो वे इसकी उम्मीद भी छोड़ चुके हैं, क्योंकि जम्मू-कश्मीर से विभाजनकारी अनुच्छेद 370 और 35 ए हटने के बाद भी उनकी वापसी की कोई सही राह नहीं निकल पा रही है। इसलिए नहीं निकल पा रही है, क्योंकि आतंकवाद में कमी आने के बाद कश्मीर का माहौल वैसा नहीं कि कश्मीरी हिंदू निश्चिंतता के साथ वहां लौटने का सोच सकें। वे ऐसा इसलिए नहीं सोच पा रहे हैं, क्योंकि कश्मीर में जब-तब उन्हें निशाना बना लिया जाता है।

5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 हटने के बाद से करीब पांच हजार कश्मीरी हिंदुओं को प्रधानमंत्री विकास पैकेज के तहत सरकारी नौकरियां प्रदान की गईं, लेकिन उनमें से कई सुरक्षा के भय से फिर से पलायन कर गए। आज कश्मीर में कश्मीरी हिंदुओं की कुल आबादी दस हजार से भी कम है। इसके बाद भी कोई न तो कश्मीरियत की बात करता है और न ही इंसानियत की। जम्हूरियत की बात अवश्य होती है। फारूक अब्दुल्ला ने कश्मीरी पंडितों को अपने घरों को लौटने के मामले में यह भी कहा कि वैसे अब उनकी स्थायी वापसी मुश्किल है, क्योंकि वे देश के अन्य हिस्सों में बस चुके हैं और उनके बच्चे पढ़ाई और रोजगार में व्यस्त हैं।

यह एक हद तक सच भी है, विस्थापित कश्मीरी हिंदुओं के जो बच्चे देश-विदेश में रह रहे हैं, उनका कश्मीर से उतना जुड़ाव नहीं है जितना उनके माता-पिता का है, क्योंकि उनमें से अनेक के पास वहां की यादें ही नहीं हैं। इनमें से तमाम कश्मीर के बाहर जम्मू, दिल्ली या देश के अन्य शहरों में पैदा हुए और पले-बढ़े, लेकिन एक सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 62 प्रतिशत विस्थापित कश्मीरी हिंदू सुरक्षा की गारंटी मिलने पर अपने घरों को लौटना चाहते हैं। इसके बाद भी पिछले पांच वर्षों में 610 कश्मीरी हिंदुओं को ही उनकी जमीनें वापस दिलाई जा सकी हैं। अनेक कश्मीरी हिंदू ऐसे हैं, जो अपने घरों को संरक्षित देखना चाहते हैं, ताकि वे कभी वहां जाकर कुछ समय बिता सकें और अपनी जड़ों से जुड़ सकें। वे इसलिए अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहते हैं ताकि उनकी संस्कृति संरक्षित रहे।

1989-90 में कश्मीर में जब आतंकवाद अपने चरम पर था और वहां कश्मीरी हिंदुओं के खिलाफ खौफनाक नारे लग रहे थे और उन्हें चुन-चुन कर मारा जा रहा था, तब कितने कश्मीरी हिंदुओं और सिखों ने अपना घर-बार छोड़ा, इसकी संख्या को लेकर मतभेद है, लेकिन यह तथ्य है कि अपनी बचाकर भागे करीब 50 हजार कश्मीरी हिंदू जम्मू के शरणार्थी शिविरों में लंबे समय तक रहे। इससे बड़ी त्रासदी और कोई नहीं कि कोई अपने ही देश में शरणार्थी बन जाए, लेकिन कश्मीरी हिंदुओं के साथ ऐसा ही हुआ।

यह स्थिति राष्ट्रीय शर्म का विषय बननी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कश्मीरी हिंदुओं के पलायन के लिए कौन जिम्मेदार है, यह प्रश्न प्रायः राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में गुम हो जाता है, लेकिन सच यह है कि उन्हें न्याय दिलाने के लिए जैसी सामूहिक राजनीतिक इच्छाशक्ति प्रदर्शित की जानी चाहिए थी, उसका अभाव ही व्याप्त रहा। इस अभाव के कारण कानून के शासन को नीचा देखना पड़ा और न्याय का उपहास उड़ा। इसके साथ ही इससे आतंकियों को बल मिला। उन्हें यह संदेश गया कि वे भारत के शासन को झुकाने में सफल रहे।

कश्मीरी हिंदुओं की अनदेखी एक के बाद एक सरकारों ने तो की ही, सुप्रीम कोर्ट ने भी की। उसने कश्मीर में उनकी सुनियोजित हत्या के मामलों की जांच कराने से यह कहकर मना कर दिया कि अब बहुत देर हो चुकी है। इस कथन ने न्याय में देर के साथ अंधेर को ही चरितार्थ किया। वास्तव में जब भी कोई पलायन के लिए बाध्य होता है और फिर वह चाहकर भी अपनी जमीन पर वापस नहीं लौट पाता तो कानून के शासन की हेठी के साथ अन्याय के आगे न्याय पस्त होता है।

जैसा कश्मीरी हिंदुओं के साथ हुआ, वैसा किसी के साथ नहीं होना चाहिए। इसके लिए यह आवश्यक है कि जो भी कश्मीरी हिंदू अपने घरों को लौटना चाहते हैं, उन्हें वहां हर हाल में बसाने के जतन किए जाएं, भले ही उनके लिए कश्मीर घाटी में विशेष संरक्षित क्षेत्र बनाने पड़ें। इससे ही आतंकियों को यह संदेश जाएगा कि भारत आतंक के समक्ष झुकने वाला नहीं है। यदि इजरायल फलस्तीन में यहूदियों को बसाने के लिए विशेष बस्तियां बना सकता है तो भारत अपनी ही जमीन पर कश्मीरी हिंदुओं को बसाने के लिए ऐसा क्यों नहीं कर सकता?

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