Ads Area

Aaradhya beauty parlour Publish Your Ad Here Shambhavi Mobile Aaradhya beauty parlour

हाईकोटः चार्जशीट दाखिल के बाद मजिस्ट्रेट के संज्ञान पर फंसा पेंच

sv news


प्रयागराज (राजेश सिंह)। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि आरोप पत्र दाखिल होने के तीन साल बाद मजिस्ट्रेट उस पर संज्ञान नहीं ले सकते हैं। यह सीआरपीसी की धारा 468 से बाधित है जिसमें समय सीमा बीत जाने के बाद मामले पर संज्ञान लेने पर रोक है। कोर्ट ने इस आधार पर चोरी के एक मामले में आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि ने फिरोजाबाद के तत्कालीन मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के स्पष्टीकरण पर भी आपत्ति जताई और कहा कि सभी मजिस्ट्रेट अदालतों में प्रचलित सामान्य चलन के अनुसार संज्ञान लेने से पहले पुलिस रिपोर्ट पर कोई गहन जांच नहीं की जाती है।

मामला मोटरसाइकिल चोरी से जुड़ा था, जिसकी प्राथमिकी जुलाई 2019 में आईपीसी की धारा 379 के तहत दर्ज की गई। पहली चार्जशीट पांच आरोपियों के खिलाफ दी गई। जिस पर 2019 में ही संज्ञान लिया गया था। याची अवनीश कुमार व आरोपी सूरज ठाकुर के खिलाफ जांच कोर्ट में लंबित रही। इन दोनों के खिलाफ दूसरी चार्जशीट 26 जून 2021 को तैयार की गई।

हालांकि यह तीन साल से अधिक समय तक सीओ सिटी फिरोजाबाद के पास पड़ी रही। आखिरकार इसे नवंबर 2024 में कोर्ट में पेश किया गया। तीन साल की समय सीमा की अनदेखी करते हुए संबंधित मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने घटना के पांच साल से अधिक और चार्जशीट की तारीख के तीन साल बाद इसका संज्ञान लिया। याची ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी।

सरकारी वकील ने कहा कि कानून में निर्धारित अवधि (इस मामले में तीन साल) समाप्त होने के बाद संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट संज्ञान नहीं ले सकते थे। इस पर हाईकोर्ट ने संबंधित सीजेएम से स्पष्टीकरण मांगा कि सीआरपीसी की धारा 468 और 469 के तहत प्रदान की गई समय सीमा के बाद संज्ञान क्यों लिया गया। अपने स्पष्टीकरण में संबंधित सीजेएम ने स्वीकार किया कि सद्भावनापूर्ण चूक के कारण समय सीमा का बिंदु उनके मस्तिष्क में नहीं आया। उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया कि राज्य की सभी मजिस्ट्रेट अदालतों में और शायद अन्य राज्यों में भी प्रचलित सामान्य प्रथा के अनुसार अपराधों का संज्ञान लेने के उद्देश्य से पुलिस रिपोर्ट यानी चार्जशीट (या अंतिम रिपोर्ट) मिलने पर रिकॉर्ड की कोई गहन जांच या परीक्षण नहीं किया जाता। मजिस्ट्रेट केवल केस डायरी में उपलब्ध सामग्री के आधार पर प्रथम दृष्टया राय बनाते हैं।

कोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को खारिज करते हुए कहा कि ऐसी प्रथा उस कानून की जगह नहीं ले सकती, जिसका उल्लेख आपराधिक प्रक्रिया संहिता में नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे स्पष्टीकरण और विवादित आदेश के लिए यह माना जा सकता है कि अधिकारी अपनी न्यायिक सेवा को बहुत हल्के में ले रहे है।

इसे न्याय देने के गंभीर दायित्व के रूप में नहीं मान रही है। कोर्ट ने कहा कि पीठासीन अधिकारी का व्यवहार और आचरण, जैसा कि उनके स्पष्टीकरण व संज्ञान आदेश से पता चलता है, प्रथम दृष्टया उनके पद के लिए अशोभनीय आचरण को दर्शाता है। कोर्ट ने उन्हें भविष्य में अधिक सतर्क रहने और कानून के अनुसार सख्ती से आदेश करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने इस मामले में पुलिस अधिकारियों को भी लापरवाह पाया। साथ ही रजिस्ट्रार जनरल को भी निर्देश दिया कि यह आदेश न्यायिक प्रशिक्षण और अनुसंधान संस्थान लखनऊ को भेजें ताकि न्यायिक अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जा सके कि संज्ञान एक आपराधिक मामले का आधार है इसलिए संज्ञान आदेश कानून के अनुसार किया जाना चाहिए।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

Top Post Ad