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नैमिषारण्य की कथा सुनकर सनातन धर्म से जुड़ीं इटली की लुक्रेशिया, पिता के साथ पहुंचीं माघ मेला

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प्रयागराज (राजेश सिंह)। सनातन धर्म की शक्ति लुक्रेशिया को इटली से प्रयागराज माघ मेले में खींच लाई है। वह अपने पिता के साथ यहां नैमिशारण्य आश्रम में पहुंची हैं। उनका कहना है कि यहां आने पर उनको बहुत शांति मिलती है। प्रयागराज हजारों वर्ष पुराना है। 

माघ मेला क्षेत्र में सनातन धर्म से प्रभावित होकर इटली से आईं लुक्रेशिया श्रद्धालुओं के आकर्षण और चर्चा का केंद्र बनी हैं। गुरु ज्ञान मिलने के बाद से वह प्रयाग को तीर्थराज और गंगा को मां बुलाती हैं। खुद के बारे में कुछ पूछने वालों से जयश्री राम का जयकारा लगाते हुए कहती हैं कि गंगा मइया की जय। उनका पहनावा तो विदेशी है लेकिन भाव भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत दिखे। हाथ जोड़कर वह प्रणाम बोलती हैं और संगम की रेत को स्वर्ग (हैवेन )करार देती हैं।

लुक्रेशिया इटली से अकेली नहीं अपने पिता आंजलो संग माघ मेला क्षेत्र आई हैं। हिंदी में बात करने में कुछ असहज थीं लेकिन टूटीफूटी हिंदी में उन्होंने कहा कि यहां धरती का स्वर्ग है। गुरुजी की सानिध्य में शांति मिलती हैं। यहां कैसे आईं, गुरुजी से कैसे मिलीं, इस बारे में भी उन्होंने सारा कुछ बताया लेकिन उनके गुरु नैमिषारण्य में मढ़िया घाट मैगलगंज के नागा बाबा मनमौजी राम पुरी ने विस्तृत जानकारी दी कि वह कैसे उनके संपर्क में आईं और उनकी शिष्या बनीं।

नैमिषारण्य तीर्थ की महिमा सुनकर बनीं शिष्या

नैमिषारण्य में मढ़िया घाट मैगलगंज के नागा बाबा मनमौजी राम पुरी ने बताया कि वर्ष 2024 में लुक्रेशिया उनसे मिली थीं। वह रोज उन्हें प्रणाम करती और कहां से हैं, इस बारे में पूछती। तब उसके साथ दूभाषिया और कुछ भारतीय मित्र भी थे। बाबा मनमौजी के मुताबिक हमने बिटिया लुक्रेशिया को नैमिषारण्य तीर्थ की महिमा सुनकर उनसे जुड़ी फिर शिष्या बन गई। यही नहीं, उसके पिता आंजलो और कई विदेशी उनके शिष्य हैं।

प्रयाग में मोक्ष और नैमिषारण्य तपोभूमि

नागा बाबा मनमौजी राम पुरी के मुताबिक प्रयागराज तीर्थों का राजा है। यहां कल्पवास, साधना करने वालों को शांति, मोक्ष की प्राप्ति होती है। हम यहां कुंभ और माघ मास, दोनों में आकर धूनी रमाते हैं। वहीं नैमिषारण्य तपोभूमि है। वहां 85 कोसा की परिक्रमा है। हनुमान गढ़ी है। व्यास गद्दी के साथ काली पीठ का भी स्थान है। गोमती नदी के तट पर स्थित नैमिषारण्य तीर्थ में चक्रतीर्थ, दधीचि कुंड के साथ पांडव किला भी है। इसी तीर्थ में दशश्वमेध घाट भी है जहां भगवान राम ने यज्ञ किया था। इसी तीर्थ की कथा सुनकर अन्य विदेशियों के साथ लुक्रेशिया और उसके पिता आंजलो उनके शिष्य बने।


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