प्रयागराज (राजेश सिंह)। हजारों रोडवेज बसों का दावा और श्रद्धालुओं की अरामदायक यात्रा का दंभ माघ मेला के पहले ही स्नान पर्व पर रणनीतिक सामंजस्य नहीं होने से ध्वस्त हो गया। भीड़ का रेला तो नहीं उमड़ा लेकिन जो हजारों यात्री आए, उनको भी बिना परेशानी के शहर के अंदर बस अड्डे तक नहीं भेजा जा सका। शहर के बाहर रोकी गई बसों ने हजारों यात्रियों को रात और फिर सुबह पैदल चलने पर मजबूर कर दिया।
लखनऊ, अयोध्या, विंध्याचल और चित्रकूट जैसे रूटों से आने वाली बसें शहर के अंदर बस अड्डे तक नहीं आ सकीं। नए यमुना पुल पर पुलिस ने बसों को रोक दिया। इससे जीरो रोड बस स्टेशन तक कोई बस नहीं पहुंची। नैनी लेप्रोसी चौराहे पर बसें खड़ी रहीं और यात्री वाहन के लिए भटकते रहे।
दूसरी ओर फाफामऊ में भी पुलिस ने बसों को रोक दिया, परिणाम बेला कछार में बसें खड़ी रहीं, जबकि यात्री सामान सर पर लादे कई किलोमीटर पैदल चलते नजर आए। रात के अंधेरे में ठिठुरते हुए लोग संगम की ओर गए।
बांदा से आए अरविंद कुमार यादव, उनकी पत्नी सुरेश, बेटी साक्षी ने यात्रा के बारे में सवाल करते ही गुस्से में प्रतिक्रिया दी। प्रशासन सो गया है, मीडिया भी सो रही है। भीड़ का अता-पता नहीं है, लेकिन फिर भी बसें रोकी जा रही है, क्या बस रोकने में कोई आनंद आ रहा है।
लखनऊ में रहकर सिविल सर्विसिज की तैयारी करने वाले आदर्श श्रीवास्तव ने बताया कि माता-पिता कल्पवास कर रहे हैं। रात में लगभग 11 बजे थे, पुलिस ने फाफामऊ के आगे बस नहीं जाने दी। बोले की कछार में बस अड्डा बना है, वहीं खड़ी करो। हम लोग सड़क पर उतर गए, पुल तक पैदल चले, फिर एक ई-रिक्शा मिला जिसने 500 रुपये लिए। थकान और ठंड से हालत खराब हो गई।
शटल बसों का दावा हवा-हवाई
यूपी रोडवेज ने शटल बसें चलाने का बड़ा दावा किया था, लेकिन पहले ही स्नान पर्व पर ये बसें गायब रहीं। यात्री इधर-उधर भटकते दिखे। क्षेत्रीय प्रबंधक रविंद्र कुमार सिंह ने ट्रैफिक पुलिस से बात कर देर रात कुछ बसें चलवाईं, लेकिन सुबह फिर रोक। दोपहर बाद विद्या वाहिनी मैदान में कुछ बसें आईं तो यात्रियों ने राहत की सांस ली। शाम तक झूंसी, लेप्रोसी और बेला कछार से 600 से ज्यादा बसें चलीं, लेकिन ये यात्रियों की परेशानी को हल नहीं कर सकी।
माघ मेला से पहले प्रशासन की अगुवाई में ही आंकड़ें जारी हुए कि 3800 बसें हैं, अस्थायी बस अड्डे, शटल सेवाएं और ट्रैफिक डायवर्जन। जब जमीन पर रणनीति उतारने का समय आया तो बस एक ही चीज दिखा, हर स्थान पर बैरिकेडिंग और प्रतिक्रिया कि आगे नहीं जा सकते।
सवाल यह है कि जब लाखों श्रद्धालु पहले दिन ही पहुंच रहे हैं, तो बसों को शहर के बाहर रोककर पैदल मार्च क्यों करवाया गया? क्या भीड़ नियंत्रण के नाम पर यात्रियों की सुविधा को नजरअंदाज कर दिया गया? शटल बसों का दावा कागजों तक सीमित क्यों रहा? पिछले महाकुंभ के अनुभव के बाद भी पहले स्नान पर ऐसी लापरवाही क्यों? आस्था की यह यात्रा भक्तों के लिए परीक्षा बन गई। उम्मीद है कि आने वाले स्नान पर्वों दृ मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या और वसंत पंचमी दृ में प्रशासन सबक लेगा और व्यवस्था को वाकई श्रद्धालु-केंद्रित बनाएगा। आखिर आस्था का मेला है, मजबूरी का नहीं।
