प्रयागराज (राजेश सिंह)। प्रदेश में 4,157 वकीलों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं जबकि 105 की डिग्री फर्जी मिली है। यह जानकारी इलाहाबाद हाई कोर्ट में न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ के समक्ष इटावा जिला न्यायालय के वकील मोहम्मद कफील की याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आई है। कोर्ट ने पूरे प्रदेश में वकीलों की आपराधिक पृष्ठभूमि से जुड़े गंभीर मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लेते हुए व्यापक जांच का आदेश दिया है और कृत कार्यवाही की रिपोर्ट मांगी है। अगली सुनवाई तिथि 20 अगस्त 2026 अनुपालन रिपोर्ट के लिए नियत की है।
याची के खिलाफ तीन आपराधिक मामले दर्ज हैं, जबकि उसके पांच सगे भाइयों पर कुल 31 आपराधिक मामले। इनमें मारपीट, धमकी, धोखाधड़ी, गैंग्सटर एक्ट और यहां तक कि पाक्सो एक्ट जैसी धाराएं शामिल हैं। कफील ने पुलिस उपनिरीक्षक के खिलाफ मानहानि का केस दायर किया था, जिसे मजिस्ट्रेट अदालत और सत्र न्यायालय दोनों ने खारिज कर दिया था। हाई कोर्ट ने भी इस याचिका को यह मानते हुए खारिज कर दिया कि पुलिस अधिकारी अदालती आदेश के तहत कुर्की-इश्तिहार चस्पा करने की वैधानिक ड्यूटी निभा रहे थे, इसलिए मानहानि का मामला नहीं बनता।
पुलिस महानिदेशक, अभियोजन निदेशालय और उत्तर प्रदेश बार कौंसिल की रिपोर्टों के अनुसार कुल 5,14,439 सक्रिय पंजीकृत वकीलों में 4,157 वकीलों के खिलाफ 5,056 आपराधिक मामले दर्ज हैं। यह 74 जिलों का विवरण है। हरदोई में कोई भी मामला नहीं मिला। दागी 418 वकील तीन या उससे अधिक आपराधिक मामलों में आरोपित हैं और 28 वकीलों पर 11 या उससे अधिक एफआइआर दर्ज हैं। एक वकील के खिलाफ तो 46 प्राथमिकी मिली। सबसे ज्यादा प्रभावित लखनऊ का वजीरगंज थाना है। यहां अकेले 422 वकीलों के खिलाफ 236 एफआइआर हैं।
जोन वार आंकड़ों में बरेली सबसे आगे है। यहां 534 वकीलों पर 762 मामले हैं। उसके बाद गोरखपुर जोन आता है। यहां 359 वकीलों पर 476 केस है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर हुई सत्यापन प्रक्रिया में 105 वकील ऐसे पाए गए जिनकी डिग्री ही फर्जी थी। इनमें लगभग 65 ने एलएलबी की डिग्री फर्जी बनवाई थी। सबसे ज्यादा दुरुपयोग इलाहाबाद विश्वविद्यालय के नाम का हुआ (52 मामले हैं), इसके बाद राजस्थान के श्रीधर विश्वविद्यालय पिलानी का नंबर आता है।
वैसे कोर्ट ने इस सत्यापन प्रक्रिया को ‘दिखावटी’ भी कहा। टिप्पणी की कि पांच लाख से ज्यादा वकीलों में सिर्फ 105 फर्जी डिग्रीधारकों का मिलना बेहद कम है। प्रवेश के समय वकीलों का कोई पुलिस सत्यापन नहीं किया जाता, जबकि डाक्टर, शिक्षक जैसे अन्य पेशों में अनिवार्य है। कोर्ट ने बार कौंसिल आफ यूपी की कार्यशैली पर कड़ी नाराजगी जताई।
कौंसिल ने 98 वकीलों के खिलाफ स्वतः संज्ञान लिया था और 23 के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही चल रही थी, लेकिन चुनाव की घोषणा होते ही अनुशासन समितियां भंग हो गईं और कवायद ठप पड़ गई। कोर्ट ने इसे "संस्थागत पक्षाघात" करार दिया। कहा कुछ जिला बार एसोसिएशनों विशेषकर गोरखपुर और कानपुर में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग पदाधिकारी बने बैठे हैं। कई जिला अदालतों में वकालत की आड़ में संगठित गिरोह, डिक्री के जबरन निष्पादन, कब्जा दिलाने और किरायेदारों को जबरन बेदखल करने जैसे कामों में लिप्त हैं।
हाई कोर्ट ने जारी किए कड़े निर्देश
1. गंभीर अपराधों (सात साल से अधिक सजा वाले, वैवाहिक विवादों को छोड़कर) में आरोपित वकीलों के खिलाफ दर्ज मामले उनके गृह जिले से हटाकर सौ किलोमीटर के दायरे में स्थित किसी अन्य जिले में स्थानांतरित किए जाएंगे। जैसे आगरा के मथुरा में, इलाहाबाद (प्रयागराज) के प्रतापगढ़ में। यह व्यवस्था पहले पांच साल पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लागू होगी।
2. बार कौंसिल आफ यूपी सचिव को निर्देश दिया गया कि सभी 105 फर्जी डिग्रीधारक वकीलों के खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी की एफआइआर दर्ज कराएं।
3. गंभीर अपराधों में आरोपित वकीलों की प्रैक्टिस, अनुशासनात्मक कार्यवाही/मुकदमे के निष्कर्ष तक स्थगित रहेगी। कहा, यह निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने का उपाय है।
4. एफआइआर दर्ज होते या चार्जशीट दाखिल होते ही, संबंधित पुलिस अधिकारी को जिला जज, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और बार कौंसिल सचिव को तुरंत सूचित करना होगा।
5. हर जिले में डीएम, एसएसपी और जिला जज महीने में एक बार बैठक कर अनुपालन की समीक्षा करेंगे।
6. यदि किसी वकील को निलंबित किया जाता है तो पक्षकार को नया वकील नियुक्त करने का उचित अवसर मिलेगा। जरूरत पर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण मुफ्त कानूनी सहायता देगा।
संरचनात्मक सुधार के भी सुझाव
कोर्ट ने बार कौंसिल को कई सुझाव भी दिए हैं जैसे विश्वविद्यालयों के साथ डिजिटल लिंकेज बनाकर डिग्री का रियल-टाइम सत्यापन, हर वकील से आपराधिक मामलों की वार्षिक शपथपत्र में जानकारी अनिवार्य किया जाना तथा चुनावी प्रभाव से मुक्त स्थायी अनुशासन ट्रिब्यूनल का गठन।
‘कानून दो बार मरता है, एक बार जब उसके अधिकारी अपराधी बन जाते हैं और दूसरी बार जब जज चुप्पी को न्यायिक साहस पर तरजीह देते हैं। जिस तरह धृतराष्ट्र की चुप्पी ने अन्याय को बढ़ावा दिया, उसी तरह जब सत्ता में बैठे लोग अन्याय पर मूक दर्शक बने रहते हैं तो उसकी कीमत पूरी पीढ़ी को चुकानी पड़ती है।’
- इलाहाबाद हाई कोर्ट
