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सवालों के घेरे में हैं 'जेएनयू के क्रांतिकारियों' की 'चयनित चुप्पियां'

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स्त्रियों ने इस समय में अपनी शक्ति को पहचान लिया है। वे बेहतर कर रही हैं और आगे आसमां छूने की कोशिशों में हैं। यहां भी पुरुष सत्ता चोटिल होती हुई लगती है। उसके प्रति सम्मान और संवेदनशीलता के बजाए, किस्से बनाने और उसे कमतर साबित करने की कोशिशें हर स्तर हो रही हैं...

शिक्षा केंद्रों की कलंक कथाएं अनंत हैं। गुरु-शिष्य परंपरा को लजाते प्रकरण मुंह चिढ़ा रहे हैं। ऐसी खबरें अब बहुत विचलित नहीं करतीं। किंतु बात जब जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय जैसे शिक्षा केंद्र की हो तो मामला साधारण नहीं रह जाता। आरोप किसी साधारण शिक्षक पर नहीं, मणिपुर से लोकसभा के सांसद प्रोफेसर अंगोमचा बिमोल अकोइजम पर हैं। वे जेएनयू के सामाजिक विज्ञान अध्ययन केंद्र में प्राध्यापक थे। जेएनयू प्रशासन ने 11 छात्राओं की शिकायतों की जांच के बाद प्रोफेसर अंगोमचा बिमोल अकोइजम को बर्खास्त कर दिया है। वे अभी सांसद बने हुए हैं। प्रो. बिमोल ने इन आरोपों पर सफाई देते हुए कहा कि उन्हें सरकार विरोधी रवैये के कारण शिकार बनाया जा रहा है। इस सफाई के बहुत मायने नहीं हैं। मुद्दा है शिक्षक की गरिमा का, यदि वह जनप्रतिनिधि हैं तो मामला गंभीर हो जाता है।

कटघरों को तोड़कर आगे आती बेटियां-

जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय में जागरुक विद्यार्थियों की संख्या काफी है। राजनीतिक तौर पर भी उनकी सक्रियता किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में किसी प्राध्यापक का यह रवैया आश्चर्यजनक है। उन छात्राओं के साहस को भी नमन करना चाहिए, जिनके कारण यह प्रकरण प्रकाश में आ सका। हमारी परंपरा में शिक्षक अपने विद्यार्थियों के लिए अभिभावक हैं। इस गरिमा को छोड़कर अपने विद्यार्थियों का किसी भी तरह का शोषण स्वीकार्य नहीं है। यह उस अकादमिक भरोसे की हत्या है, जिस पर शिक्षा की नींव टिकी है। आरोपी प्रोफेसर के बारे में विश्वविद्यालय की आंतरिक शिकायत समिति ने शिकायतों को सही पाया है। नैतिकता के आधार पर उन्हें सांसद पद से इस्तीफा देना चाहिए। उनकी अपनी कांग्रेस पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक बयान अभी तक सामने नहीं आया है। यह बात रेखांकित करती है कि शिक्षा केंद्रों में शिक्षक सुरक्षित माहौल नहीं देगें तो युवा पीढ़ी का मानसिक और शैक्षणिक विकास कैसे होगा? यह भी सुखद है कि जागरुक विद्यार्थी अब किसी तरह के शोषण को सहने को तैयार नहीं हैं। पीड़िताएं अब डरने के बजाए संस्थागत प्रक्रियाओं का दरवाजा खटखटा रही हैं।

स्त्रियों ने इस समय में अपनी शक्ति को पहचान लिया है। वे बेहतर कर रही हैं और आगे आसमां छूने की कोशिशों में हैं। यहां भी पुरुष सत्ता चोटिल होती हुई लगती है। उसके प्रति सम्मान और संवेदनशीलता के बजाए, किस्से बनाने और उसे कमतर साबित करने की कोशिशें हर स्तर हो रही हैं। तेज होते सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के इस दौर में सिर्फ कानून ही स्त्री के साथ खड़े हैं। कई जगह स्त्रियां भी, स्त्रियों के खिलाफ खड़ी हैं। यह संक्रमण काल है, स्त्री को अपने वजूद को साबित करते हुए निरंतर आगे बढ़ने का समय है। वह जीत रही है और आगे बढ़ रही है। आज की बेटियां अपने सपनों में रंग भर रही हैं। आसान शिकार होने के नाते कुछ शिकारी उसकी घात में हैं, किंतु आज की औरत इससे डरती नहीं। घबराती नहीं। वह बने-बनाए कठघरों को तोड़कर आगे आ रही है।

दलगत सीमाओं से ऊपर उठें-

कानून से ऊपर कोई नहीं है। आरोपी प्रोफेसर सांसद हैं तो उन्हें कुछ विशेषाधिकार जरुर हासिल हैं। ऐसे में मुद्दा यह भी है कि जब कानून बनाने वाले ही महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं तो राजनीतिक शुचिता का क्या होगा। दलगत राजनीति और चयनित चुप्पियों के समय में राजनीतक दलों का रवैया दोमुंहा हो जाता है। टीवी डिबेट्स में राजनीतिक दलों की महिला प्रवक्ता भी उक्त प्राध्यापक का बचाव करते नजर आ रहे हैं। यह तर्क भी कितने गलीज हैं कि दूसरे दल के लोगों पर भी आरोप लगे हैं। इससे गहरी राजनीतिक संवेदनहीनता प्रकट होती है। आपको इसलिए छोड़ दिया जाए क्योंकि प्रतिपक्ष पर भी ऐसे आरोप हैं। नैतिकता और महिला सुरक्षा के मुद्दों पर दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर स्त्री सम्मान के लिए सभी को खड़ा होना चाहिए। संसद को हम लोकतंत्र का मंदिर मानते हैं। वहां बैठे सांसदों से उच्च नैतिक आचरण की अपेक्षाएं बेमानी नहीं हैं। हालात इतने बदतर हैं कि गंभीर आरोपों से घिरे लोग अकसर संस्थागत जांच की वैधता पर सवालिया निशान लगाकर सहानुभूति हासिल करने का प्रयास करते हैं। इस मामले में भी यही दिख रहा है। वहीं दूसरी ओर जेएनयू प्रशासन का यह दावा कि उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए आंतरिक समिति की रिर्पोट के आधार पर सांसद-प्राध्यापक पर कार्रवाई की गई है। यह साबित करता है कि राजनीतिक पदों की धमक से ऊपर अब संस्थागत नियमों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

लक्ष्मण रेखा खींचने की जरुरत-

विश्वविद्यालयों के परिसरों में वैचारिक विमर्श हों। संवाद हों। किंतु वे ताकतवर लोगों के लिए सुरक्षित शरणगाह नहीं बनें। लक्ष्मण रेखा खींचने की जरुरत है। इस पर शिक्षकों को विचार करना होगा। अपने गिरेबां में झांकना होगा। शिक्षा परिसरों में पुलिस डेरा डाल रही है। उनकी स्वायत्तता और सम्मान आज हाशिए पर है। राजनीतिक दलों से जुड़ी अपनी आस्थाओं के कारण अगर शिक्षक अपनी भूमिका से समझौता करेगें, तो उनका सम्मान बच नहीं सकता। विचारधारा और देशद्रोही विचारों के आधार पर चलने वाली शक्तियां परिसर को तो कलंकित करेंगी। शिक्षकों के सम्मान को आहत करेंगी। जेएनयू में कई वर्षों से चल रही भारत विरोधी गतिविधियों को रोकने, संभालने और अपने युवाओं को सही राह दिखाने की कोशिशें होतीं तो यह आज नासूर बनकर न फूटता। सवाल सीधा है कि  जेएनयू में हर देशद्रोही को स्पेस क्यों मिल जाता है? कोई भी विचार तभी तक स्वीकार्य है, जब तक हमारी अकादमिक योग्यताओं को निखारने और संवर्धित करने में सहायक हो। जो विचार देश तोड़ने और उसके टुकड़े करने के स्वप्न देखे उसका मिट जाना ही ठीक है। 

संस्थागत जवाबदेही जरुरी-

अब जबकि स्त्रियों के सम्मान का मामला सामने है, तब ‘जेएनयू के क्रांतिकारियों’ की चयनित चुप्पियां सवालों के घेरे में हैं। यह प्रकरण अपने पद का दुरुपयोग करते हुए छात्राओं के उत्पीड़न का है। यह गुरु-शिष्य संबंधों को प्रभावित करता है। छात्राओं को भयभुक्त वातावरण प्रदान करना शासन- विश्वविद्यालय प्रशासन की जिम्मेदारी है। क्यों हम अपने परिसरों को छात्राओं के लिए सुरक्षित स्थान नहीं बना पाए हैं? जेएनयू जैसे जागरुक परिसर में ऐसा हो रहा है तो छोटे स्थान पर क्या हो रहा होगा? किसी छात्रा के लिए सत्ता प्रतिष्ठान से टकराना साधारण नहीं होता। बात जब यौन उत्पीड़न की हो मामला और संवेदनशील हो जाता है। छात्राओं को हिम्मत देना जरूरी है। जेएनयू की प्रथम महिला कुलपति प्रोफेसर शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित ने संवेदना के साथ इस विषय में न्याय किया है। समाज के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। स्त्री सुरक्षा से जुड़े मामलों में ऐसी ही कार्रवाई अपेक्षित है।

इस मामले के बाद उच्च शिक्षा परिसरों में सुरक्षा, सत्ता के दुरुपयोग और संस्थागत जबावदेही के सवाल उठेंगे। इसलिए इसका परिप्रेक्ष्य व्यापक है। “लड़की हूं लड़ सकती हूं” और “बेटी बचाओ -बेटी पढ़ाओ” के नारों के बीच ऐसी घटनाएं हमें मुंह चिढ़ा रही हैं। इस सिलसिले को रोकने के लिए कौन आएगा ? जीवंत समाज अपने समाज के प्रश्नों के हल खुद खोजता है। वह टीवी बहसों से प्रभावित नहीं होता। क्योंकि ये हमेशा अंतहीन और निष्कर्षहीन ही होती हैं। स्त्री सुरक्षा पर हमने आज ही सोचने और कुछ करने की शुरुआत नहीं की तो कल बहुत देर हो जाएगी।

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