प्रयागराज (राजेश सिंह)। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि सरकारी कर्मचारी की ज़िम्मेदारी बहुत ऊँची होती है। वह सिर्फ़ सैलरी कमाने के लिए ही काम नहीं करता, बल्कि उसका काम देश बनाने में भी मदद करना है। कोर्ट ने कहा सरकारी महकमे में तेज़ी से बढ़ रहे भ्रष्टाचार को रोकने के लिए, रिटायर्ड अधिकारियों को कोई छूट नहीं मिलनी चाहिए। जनता या उसके नुमाइंदों को छूट मिलनी चाहिए कि वे किसी सरकारी कर्मचारी, चाहे वह सेवानिवृत्त हो या नौकरी में हो, को अपनी सरकारी ड्यूटी करते समय किसी भी तरह की लापरवाही के बारे में बता सकें।
एक जनप्रतिनिधि की समाज में अहम भूमिका रहती है। उसे ज़मीनी स्तर पर आम जनता की कई शिकायतें झेलनी पड़ती हैं। इसलिए हर शिकायत को राजनीति से प्रेरित नहीं कहा जा सकता। शिकायत में लगाए गए आरोपों को इस आधार पर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि वे किसी जन प्रतिनिधि या उसके रिश्तेदार ने लगाए हैं।
इसी के साथ कोर्ट ने तकनीकी कनिष्ठ अभियंता फर्रुखाबाद को पद से सेवा निवृत्त होने के बाद जांच में अनियमितता पाये जाने पर जारी कारण बताओ नोटिस पर हस्तक्षेप से इंकार कर दिया है और याची को नोटिस का जवाब देने तथा सक्षम अधिकारी को याची की सेवानिवृत्ति को ध्यान में रखते हुए नियमानुसार अनुमन्य कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।
यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकलपीठ ने विपिन चन्द्र वर्मा की याचिका को खारिज करते हुए दिया है।
याची के खिलाफ विधायक के साले ने विधानसभा अध्यक्ष से अनियमितता की शिकायत की जांच करने की मांग की। जिस पर जिलाधिकारी को जांच करने का आदेश दिया गया। जिलाधिकारी फर्रुखाबाद ने तीन सदस्यीय जांच कमेटी बनाई। जिसने अनियमितता बरतने की पुष्टि के साथ अपनी रिपोर्ट जिलाधिकारी को सौंपी। तब तक याची सेवानिवृत्त हो चुका था। जिलाधिकारी ने याची को अनियमितता के आरोपों का जवाब देने के लिए कारण बताओ नोटिस दी। जिसे यह कहते हुए चुनौती दी गई कि वह अब सेवानिवृत्त हो चुका है। स्वामी सेवक का संबंध नहीं रह गया है। इसलिए सेवानिवृत्त कर्मचारी के विरुद्ध कार्रवाई नहीं की जा सकती। नोटिस रद्द की जाय। सरकार की तरफ से विरोध किया गया। कहा गया कि केवल कारण बताओ नोटिस दी गई है।जिसका जवाब मांगा गया है।ऐसे में याचिका पोषणीय नहीं है। कोर्ट ने याचिका को पोषणीय नहीं माना और हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया।
