प्रयागराज (राजेश सिंह)। लग्जरी कार वाले, चाबी वाले, कांटे वाले और फटीचर बाबा ही माघ मेला में श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र नहीं हैं। कुछ विदेशी मेहमान भी हैं, जो देश भर से आए आस्थावानों का मनमोह रहे हैं। उन्हें सुखद एहसास कर रहे हैं और चेहरे पर मुस्कुराहट ला रहे हैं। यह मेहमान हैं साइबेरियन पक्षी सीगल। कलकल कर बहती गंगा की धारा के ऊपर हवा में इन परिंदों की अठखेलियां लोगों को मन मोह रही हैं। नजारा इतना खूबसूरत होता है कि लोग टकटकी लगाए देखते ही रहते हैं।
संगम क्षेत्र में एक तरफ आस्था का मेला है तो दूसरी तरफ इन विदेशी मेहमानों का रेला। संगम नोज के आसपास इन्होंने अपना बसेरा बनाया है। आमतौर पर स्वतंत्र घूमने वाले परिंदे इंसानों से दूर रहते हैं, लेकिन इन साइबेरियन पक्षियों का स्वभाव कुछ अलग ही है। इंसानों के देखते ही यह उनके करीब आ जाते हैं। फिर चाहे कोई संगम की बीच धारा में नौकाविहार कर रहा हो या फिर पांटून पुलों से गुजर रहा हो।
साइबेरियन पक्षियों की चहचहाहत आकर्षित करती है
माघ मेले में इन दिनों करोड़ों श्रद्धालु संगम क्षेत्र में पहुंच रहे हैं। पांटून पुलों पर दिन भर श्रद्धालुओं का आवागमन रहता है। ऐसे में यह परिंदे पांटून पुलों के आसपास ही मंडराते हैं। न सिर्फ इन पक्षियों की खूबसूरती आकर्षित करती है, बल्कि इनकी चहचहाहट भी मधुर धुन की तरह ध्यान खींचती है। पांटून पुल से गुजरने वाले लोग इन्हें देख सहसा ठहर जाते हैं। कोई लइया लिखाता है तो कोई दाने। लोगों के हाथ में खाने की चीजें देख यह उनके सिर मंडराने लगती है। त्रिवेणी में पुण्य की डुबकी लगाने के लिए आने वाले लोग इन्हें करीब से देखे बिना रह नहीं पाते।
मार्च माह तक यहीं रहेगा बसेरा
प्रयागराज में इन विदेशी मेहमानों को अनुकूल वातावरण मिलता है। गंगा-यमुना व अदृश्य सरस्वती के संगम के पास यह खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं। यहां खाने-पीने की भी कमी नहीं रहती। इसलिए हर साल सर्दी की शुरुआत में अक्टूबर से ही इनका आना शुरू हो जाता है। फिर गर्मी के आने के पहले फरवरी या मार्च तक यहां रहते हैं।
