पति की मौत के बाद संन्यास का लिया था संकल्प
प्रयागराज (राजेश सिंह)। तीर्थराज प्रयाग की धरा में चेतना, विचार और विज्ञान से उपजे अध्यात्म का जीवंत संगम है। विज्ञान की सुख-सुविध से परे त्याग-तपस्या के लिए वैराग्य धारण करने वाले भी मिल जाएंगे। उन्हीं लोगों में शामिल हैं साध्वी डा. गिरिजा नंदिनी गिरि। उत्कृष्ट शिक्षा ग्रहण करने के बाद वैराग्य से मन जुड़ गया। जूना अखाड़ा के संरक्षक महंत हरि गिरि से संपर्क में आकर उनकी शिष्या बन गईं। भगवा धारण करने के बाद भजन-पूजन में जीवन समर्पित कर दिया।
मूलरूप से गाजियाबाद की निवासी डॉ. गिरिजा नंदिनी कभी डॉ. वीना गोयल के नाम से जानी जाती थीं। चौ. चरण सिंह यूनिवर्सिटी मेरठ से गणित से एमए किया। इसमें गोल्ड मेडलिस्ट रहीं।
मेवाड़ यूनिवर्सिटी से शिक्षाशास्त्र में पीएचडी, आरसीआई नई दिल्ली से डिप्लोमा इन स्पेशल एजुकेशन तथा अखिल भारतीय चिकित्सा परिषद राजघाट दिल्ली से योगा फॉर नेचुरल साइंस में डिप्लोमा किया है। यह शैक्षणिक उपलब्धियां स्पष्ट करती हैं कि उनका संन्यास पलायन नहीं बल्कि चेतन निर्णय है।
लगभग 20 वर्ष पूर्व पति के निधन के बाद उन्होंने संन्यास का संकल्प लिया था, लेकिन तत्काल नहीं। उन्होंने तय किया कि जीवन की पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद ही वैराग्य का मार्ग अपनाएंगी।
उसी के अनुरूप काम किया। गाजियाबाद के जयपुरिया इंस्टीट्यूट तथा साहिबाबाद के आइपीएम में शिक्षा विभाग में बतौर शिक्षक और प्रवक्ता लंबे समय तक सेवा देने वाली डॉ. गिरिजा का कहना है कि संन्यास का अर्थ मुक्ति की ओर भागना नहीं, बल्कि जीवन को उसके वास्तविक अर्थों में समझना है।
उनके अनुसार अध्यात्म और विज्ञान विरोधी नहीं, बल्कि एक ही सत्य की दो भाषाएं हैं। एक अंतर्मन से संवाद करती है, दूसरी तर्क और प्रयोग से। अब संन्यासिनी जीवन में उनका लक्ष्य स्पष्ट है। वह विज्ञान के माध्यम से अध्यात्म से लोगों को जोड़ने की मुहिम चला रही हैं।
योग और नेचुरल साइंस के जरिए वे शारीरिक-मानसिक संतुलन की वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करना चाहती हैं ताकि अध्यात्म केवल आस्था न रहे बल्कि अनुभव बन सके। विशेष रूप से मानसिक रूप से दिव्यांग बच्चों के पुनर्वास को लेकर उनके मन में ठोस योजनाएं हैं।
कहती हैं कि शिक्षा और योग मिलकर इन बच्चों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं। उन्हें मिली डिग्रियां व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के लिए नहीं, समाज की सेवा के लिए थीं। अब वही सेवा उनका जीवन व्रत है।
माघ मेला के इस आध्यात्मिक परिवेश में उनकी उपस्थिति यह संदेश देती है कि आधुनिक ज्ञान और सनातन साधना साथ-साथ चल सकते हैं। विज्ञान से पोषित अध्यात्म और अध्यात्म से आलोकित विज्ञान और यही उनकी साधना का मूल मंत्र है।
वह कहती है कि गुरु आज्ञा से अब वह निरंतर यात्रा पर रहेंगी। प्रयागराज के बाद वह वाराणसी जाएंगी और इसके बाद अयोध्या मथुरा सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों पर भ्रमण करती रहेंगी।
