प्रयागराज (राजेश सिंह)। संगम की रेती पर माघ मेले ने भव्य स्वरूप लेना शुरू कर दिया है। संगम तट पर हर दिन देश ही नहीं विदेश से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु संगम में आस्था की डुबकी लगाने पहुंच रहे है। अध्यात्म और भक्ति से सराबोर माघ मेले में साधु-संत अलग-अलग भेषभूषा और बोली से चर्चा में हैं।
संगम की रेती पर माघ मेले ने भव्य स्वरूप लेना शुरू कर दिया है। संगम तट पर हर दिन देश ही नहीं विदेश से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु संगम में आस्था की डुबकी लगाने पहुंच रहे है। अध्यात्म और भक्ति से सराबोर माघ मेले में साधु-संत अलग-अलग भेषभूषा और बोली से चर्चा में हैं। इन्हीं में एक हैं सेंट वाले बाबा। वह संगम लोवर मार्ग पर धूनी रमाए रेती पर भक्ति रस बांट रहे हैं।
माघ मेले में दो मुख्य बड़े स्नान पर्व मकर संक्रांति और मौनी अमावस्या से पहले साधु संगत मेले में पहुंचकर भक्तों को आशीर्वाद दे रहे हैं। जिस तरह प्रयागराज महाकुंभ 2025 में बाबाओं के रूप और जलवे निराले थे ठीक उसी तरह इस बार भी कई साधुदृसंतों अलग रूप में नजर आ रहे है। मेले में कोई साधु नाम तो कोई भेषभूषा से चर्चा में है।
ऐसे ही एक नागा बाबा मेला क्षेत्र हैं। नाम है सेंट वाले बाबा बाबा जो माघ मेला क्षेत्र के सेक्टर दो में अपनी कुटिया में पूरे शरीर में भस्म लगाकर धूनी रमाए हैं। सेंट वाले बाबा आंखों पर काला चश्मा पहनकर धूनी रमाकर तपस्या और साधना में लीन रहते है। सेंट वाले बाबा के दर्शन करने वाले श्रद्धालु भी उनसे आशीर्वाद लेने पहुंच रहे है। यह उनकी मर्जी पर निर्भर है कि वह किसी से बात करते हैं या नहीं। जब कोई भी भक्त उनसे आशीर्वाद लेने पहुंचता है तो मन होने पर सेंट वाले बाबा उसके ऊपर सेंट (परफ्यूम) छिड़ककर उसे अपना आशीर्वाद देते हैं। सेंट बाबा कहते है हम लोग मसान यानी श्मशानघाट से ये सेंट लाते है और भक्तों को प्रसाद के रूप में देते है। इसलिए मेरा नाम सेंट बाबा पड़ा।
जहां जाते हैं सेंट का पिटारा होता है साथ
सेंट वाले बाबा के मुताबिक वह कहीं भी जाते हैं तो उनके पास हमेशा सेंट से भरा पिटारा रहता है। सेंट का प्रयोग भगवान की साधना में भी किया जाता है। बाबा का असली नाम बाबा बालक दास उर्फ नारायण भूमि है। बाबा श्री पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन से जुड़े हैं। इनका गुरु स्थान पंजाब में अमृतसर है। बाबा ने बताया कि उन्होंने 13 साल की उम्र में ही अपने घर को त्याग दिया और संन्यास धारण कर लिया। उन्हें संन्यास धारण किए 17 बरस हो चुके हैं। साधु वेष धारण कर संन्यास लेने फिर दीक्षा लेने के पीछे की वजह के बारे में उनका कहना है कि कुछ भगवान की प्रेरणा हुई और कुछ उनका पूर्व जन्म का प्रारब्ध है। हर किसी के भाग्य में बाबा बना नहीं होता है। हम बाबा नहीं बनते तो संगम की रेती पर धूनी कैसे रमा पाते।
भक्ति में लीन होकर भक्तों को सुनाते हैं भजन, करते हैं मगन
सेंट बाबा उर्फ बाबा बालक दास हमेशा भगवान की भक्ति में लीन रहते हैं और श्रद्धालुओं संग भक्तों को तरह-तरह के भजन भी सुनाते हैं। सेंट बाबा ने लोगों को संदेश देते हुए भजन सुनाया कि फैशन चाहे जितना कर लो,चाहे मार लो सेंट, इस जगत में कोई नहीं परमानेंट। बाबा अपने भजनों और गानों से अपने भक्तों को आकर्षित कर रहे हैं।
बाबा ने बताया कि सेंट लगाने कि वजह यह है कि जिसमें संस्कार होगा उससे आत्माएं दूर भागेंगी और जो अपना घर छोड़कर संन्यास अपना चुका है उस पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला चाहे वो श्मशामघाट ही क्यों न चला जाए। भक्तों को बाबा सेंट लगाकर उनको उनकी मनोकामना पूरी होने के लिए आशीर्वाद दे रहे हैं।
अलग है दुनिया, अनूठेपन से श्रद्धालुओं के बीच बनते हैं श्रद्धा का केंद्र
माघ मेले में कई ऐसे अनोखे साधुदृसंत पहुंचे है जो अपनी वेशभूषा, तपस्या और अनूठे कामों से श्रद्धालुओं का ध्यान खींच रहे है। माघ मेले में धुनी रमाते बाबाओं का आकर्षक रूप देखने को मिल रहा है जिसमें लंबे जटाधारी, भस्म रमे, नागा साधु, और अजब-गजब वेशभूषा शामिल है। महाकुंभ 2025 में भी अखाड़ों से जुड़े बाबाओं ने आध्यात्मिकता के साथ-साथ सामाजिक संदेश दिए थे। इस बार भी अखाड़ों से जुड़े कुछ बाबा इन दिनों संगम की रेती पर अपनी कुटिया बनाकर लोगों का ध्यान आकार्षित कर रहे है। कहा जाता है कि ऐसे बाबाओं की एक अलग रहस्यमयी दुनिया होती है। कुछ ऐसे ही एक बाबा माघ मेले में चर्चा का विषय बने हुए है।