माघ मेला केवल उत्सव नहीं, शाश्वत चिंतन की परंपरा संस्कृति की आत्मा
प्रयागराज (राजेश सिंह)। प्रयागराज में उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र द्वारा आयोजित श्शब्द-ब्रह्म संगोष्ठीश् में विद्वानों ने माघ मेला को भारतीय संस्कृति, आस्था और ज्ञान का जीवंत प्रतीक बताया। प्रोफेसर मार्तण्ड सिंह ने इसे हमारी शाश्वत परंपरा की अभिव्यक्ति कहा, जबकि अन्य वक्ताओं ने इसे आध्यात्म, विज्ञान और लोक आस्था का अद्भुत संगम बताया।
मंगलवार को आयोजित इस संगोष्ठी में प्रोफेसर मार्तण्ड सिंह ने श्माघ मेला महात्म्यरू एक समेकित शाश्वत चिंतनश् विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि संगम तट पर लगने वाला माघ मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता और शाश्वत संस्कृति का जीवंत स्वरूप है। उनके अनुसार, माघ मेला में प्रवेश करते ही श्रद्धालुओं के मन में आध्यात्मिक चेतना, जिज्ञासा और भक्ति-भाव स्वतः जागृत हो जाता है।
प्रोफेसर सिंह ने माघ मेला को हमारी चिरंतन परंपराओं, सांस्कृतिक अस्मिता और लोक विश्वासों का प्रतीक बताया। उन्होंने तुलसीदास के रामचरितमानस का उल्लेख करते हुए कहा, श्माघ मकरगति रवि जब होई, तीरथपतिहिं आव सब कोई।श् उन्होंने यह भी बताया कि माघ मेला क्षेत्र पुराणों, निगमों और आगमों से प्रवाहित संस्कृति की अमूल्य धरोहर है, जहां संगम तट पर प्रकृति स्वयं गेरुए स्वरूप में उपस्थित प्रतीत होती है।
संगोष्ठी में सरस्वती पत्रिका के संपादक अनुपम परिहार ने कहा कि माघ मेला ज्ञान, आस्था, अनुष्ठान और विज्ञान का अद्भुत संगम है। उन्होंने बताया कि यहां ज्ञान-पिपासु सत्य की खोज में आते हैं, जबकि सामान्य जन कल्पवास और पुण्य स्नान के माध्यम से आत्मशुद्धि की कामना करते हैं। परिहार ने गंगाजल की वैज्ञानिक विशेषताओं और उसकी शुद्धता पर भी प्रकाश डाला।
इस अवसर पर ब्रह्मनाद कला महोत्सव प्रतियोगिता के तहत काव्य-पाठ का आयोजन किया गया। वासुदेव पाण्डेय, आरती सिंह, प्रियंका यादव और रविराधेय ने अपनी कविताओं के माध्यम से प्रयागराज और संगम की महिमा का भावपूर्ण चित्रण किया। श्रोताओं ने इन प्रस्तुतियों की सराहना की। कार्यक्रम का शुभारंभ केंद्र निदेशक सुदेश शर्मा और अन्य वक्ताओं द्वारा दीप प्रज्वलन से हुआ।
