प्रयागराज (राजेश सिंह)। हिंदू धर्म में मकर संक्रांति का खास महत्व है। इस दिन ग्रहों के राजा सूर्यदेव की विशेष आराधना करने का विधान हैं। आपको बता दें कि इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। मतलब सूर्य देव शनि के घर में प्रवेश करते हैं। इन दोनों ग्रहों का मिलन होता है। इस साल मकर संक्रांति का पर्व 14 जनवरी यानी आज मनाया जा रहा है। वहीं इस दिन अगर आप व्रत रख रहे हैं तो व्रत कथा पढ़ना भी जरूरी माना जाता है। वर्ना पूजा अधूरी मानी जाती है।
सूर्य-शनि की कथा
मकर संक्रांति संबंधित पहली व्रत कथा भगवान शनि और सूर्य देव से संबंधित है। जब शनिदेव का जन्म माता छाया हुआ था, तो वह बिल्कुल काले उत्पन्न हुए थे। तब भगवान सूर्य ने उन्हें देखकर कहा था कि वह मेरा पुत्र नहीं है और उन्हें और माता छाया को अलग कर दिया था। वह जिस घर में रहते थे उनका नाम कुंभ था।
जब छाया ने अपने पुत्र के बारे में ऐसे अपशब्द सुने, तो उन्होंने सूर्यदेव के ऊपर अधिक क्रोध आया है और उन्हें कुष्ठ रोग होने का शाप दे दिया। इसके बाद सूर्यदेव ने भी शनिदेव और छाया माता के घर कुंभ को जला डाला। इसके बाद सूर्य देव को कुष्ठ की समस्या उनके पुत्र यम से सही की थी। लेकिन उन्होंने अपने पिता से कहा कि वह माता छाया से व्यवहार सही करें। इस बात को सुनकर सूर्यदेव शनिदेव से मिलने उनके घर पहुंचे। लेकिन जैसे ही उनके घर पहुंचे, तो उन्होंने राख का ढेर ही मिला। ऐसे में शनिदेव से काले तिल से अपने पिता का स्वागत किया था। सूर्यदेव अपने पिता का स्वागत सत्कार देखकर अति प्रसन्न हुए और उन्हें मकर नाम का घर दिया। इसी के कारण शनिदेव को मकर और कुंभ का स्वामी कहा जाता है। इसके साथ ही सूर्य ने शनिदेव से कहा कि सूर्य जब मकर घर यानी मकर संक्रांति के दिन घर आएंगे, तो वह धन-धान्य से भर जाएगा। इसी के कारण इस दिन हर साल मकर संक्रांति मनाई जाती है।
भीष्म पितामह की इच्छा मृत्यु का कथा
महाभारत काल में मकर संक्रांति का अत्यंत गहरा और आध्यात्मिक महत्व है, जो भीष्म पितामह से जुड़ा हुआ है। भीष्म पितामह को ईश्वर द्वारा इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद जब वे अर्जुन के बाणों की शय्या पर पड़े थे, उस समय सूर्य दक्षिणायन में था। शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन में शरीर त्यागने से जीव को मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती।
मोक्ष की कामना से भीष्म पितामह ने कई दिनों तक सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की। जैसे ही सूर्य ने मकर राशि में प्रवेश किया और उत्तरायण प्रारंभ हुआ, उन्होंने अपने शरीर का त्याग किया। यही कारण है कि मकर संक्रांति को मोक्ष का द्वार खोलने वाला पावन दिवस माना जाता है।