इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याची नर्स की अग्रिम जमानत अर्जी मंजूर की
प्रयागराज (राजेश सिंह)। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा कि किसी आरोपी के खिलाफ क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की धारा 82 के तहत उद्घोषणा जारी करने से उसकी अग्रिम ज़मानत की अर्जी पर विचार करने पर पूरी तरह से रोक नहीं लगती है। सुप्रीम कोर्ट के 2024 के आशा दुबे बनाम मध्य प्रदेश राज्य के मामले में दिए गए फैसले पर भरोसा करते हुए जस्टिस गौतम चौधरी की बेंच ने पेशे से नर्स मोनिका द्वारा दायर अग्रिम ज़मानत की अर्जी मंजूर कर ली।
कोर्ट ने कहा कि अर्जी देने वाली महिला ष्गर्भवतीष् थी और उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी होने से कुछ दिन पहले ही उसने एक बच्चे को जन्म दिया था। बेंच ने कहा ,...ऐसा नहीं है कि सभी मामलों में अग्रिम ज़मानत देने की अर्जी पर विचार करने पर पूरी तरह से रोक होगी, जैसा कि इस मामले में जब अर्जी देने वाली महिला के खिलाफ कुछ प्रक्रियाएं जारी की गईं, तो वह गर्भवती थी और संबंधित कोर्ट के सामने पेश नहीं हो पाई थी, इसलिए यह कोर्ट इसे अग्रिम ज़मानत देने के लिए एक सही मामला मानता है।
अर्जी देने वाली याची महिला आई पी सी की धारा 316 (दोषपूर्ण हत्या के बराबर काम से अजन्मे बच्चे की मौत का कारण बनना), 420 (धोखाधड़ी), 504, 120-ठ और मेडिकल काउंसिल एक्ट की संबंधित धाराओं के तहत दर्ज एक मामले में अग्रिम ज़मानत मांग रही थी। उसके खिलाफ आरोप था कि वह उस अस्पताल में नर्स के तौर पर काम करती थी जहां कथित घटना हुई। शुरुआत में शिकायतकर्ता के वकील ने एक प्रारंभिक आपत्ति उठाई। यह कहा गया कि चूंकि अर्जी देने वाली महिला के खिलाफ पहले ही गैर-जमानती वारंट और सीआरपीसी की धारा 82 और 83 के तहत उद्घोषणा जारी की जा चुकी थी, इसलिए उसकी अग्रिम ज़मानत की अर्जी पर विचार करने का कोई औचित्य नहीं था।
याची महिला की ओर से पेश हुए अधिवक्ता ने तर्क दिया कि अर्जी देने वाली महिला सिर्फ एक दाई नर्स थी, जो सह-आरोपी की देखरेख में काम करती थी और कथित घटना से उसका कोई सीधा संबंध नहीं था। घोषणा के मुद्दे पर बात करते हुए वकील ने बताया कि चार्जशीट नवंबर 2024 में दायर की गई और मई 2025 में संज्ञान लिया गया। हालांकि, जब 10 अक्टूबर, 2025 को गैर जमानती वारंट जारी किया गया तो आवेदक ष्गर्भवतीष् थी और उसने 6 अक्टूबर, 2025 को एक लड़के को जन्म दिया था।
कहा गया कि संज्ञान के चरण के बाद आवेदक ने हर तारीख पर अपनी व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट के लिए कोर्ट में कई आवेदन दिए, क्योंकि वह गर्भवती थी और ट्रायल कोर्ट के सामने पेश नहीं हो सकती थी। हालांकि, इस पर विचार किए बिना उसके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया गया।
हाईकोर्ट ने पाया कि इस मामले में जब उसके खिलाफ खास प्रक्रियाएं जारी की गईं तो वह गर्भवती थी और संबंधित कोर्ट के सामने पेश होने में असमर्थ थी। इस प्रकार, हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत देना उचित समझा।
