उनकी जगह सिर्फ पाकिस्तान; प्रयागराज माघ मेला में लैंड रोवर, पोर्श कारों से चलते हैं...
प्रयागराज (राजेश सिंह)। मोह-माया से मुक्त। सुख-सुविधाओं का त्याग। परमात्मा की प्राप्ति को कठोर तप में लीन हैं संत और गृहस्थ। लाखों तपस्वी संगम की रेती पर धूनी रमाएं हैं। इसी आध्यात्मिक वातावरण में कुछ संत अपने रहन-सहन और वाहन से लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। उन्हीं संतों में शामिल हैं खाकचौक व्यवस्था समिति के महामंत्री जगदगुरु संतोषाचार्य सतुआबाबा।
सतुआ बाबा कभी ठेला पर बैठकर दर्शन देने निकलते हैं, कभी चार्टर्ड प्लेन में लेटकर उड़ते हुए उनका वीडियो इंटरनेट मीडिया में प्रसारित होता है। पिछले काफी दिनों से उनकी लग्जरी गाड़ी डिफेंडर चर्चा चल ही रही थी कि बुधवार को रेती पर पोर्शे पर सवार होकर भ्रमण पर निकल पड़े। करोड़ों रुपये की यह गाड़ी श्रद्धालुओं के साथ संतों के कौतूहल का केंद्र बनी है।
संतों की छवि त्याग, वैराग्य और सादगी की प्रतीक मानी जाती है। इसके बीच सतुआ बाबा के शिविर में लग्जरी गाड़ियों की मौजूदगी लोगों को चौंका रही है। कई श्रद्धालु इन्हें देखने के लिए रुकते हैं, फोटो लेते हैं। हालांकि सतुआ बाबा के अनुयायियों का कहना है कि शिविर में भजन-कीर्तन, साधना और सेवा कार्य नियमित चल रहे हैं। तपस्वीनगर के महामंडलेश्वर गोपाल दास जी महाराज कहते हैं कि सतुआबाबा चार से पांच घंटे साधना करते हैं। साधना के बाद संतों और श्रद्धालुओं के बीच जाते हैं।
खाक चौक व्यवस्था समिति के महामंत्री के रूप में उनकी अलग पहचान और सम्मान है। रही बात लग्जरी गाड़ियों की तो आधुनिक संसाधनों का उपयोग आध्यात्मिक जीवन के खिलाफ नहीं है। सतुआ बाबा कहते हैं कि पोर्शे गाड़ी दिल्ली से मंगाई है।
संतों ने उसका पूजन किया। जिनको यह लगता है कि सतुआ बाबा के पास ये गाड़ी क्यों है? मैं उनको धन्यवाद देता हूं कि उन्हें स्मरण है कि सनातन कितना आगे है। लग्जरी गाड़ियां संतों की स्वीकार्यता और सम्मान का प्रमाण हैं। सतुआ बाबा संतों की पीठ है। हर संत का उससे जुड़ाव है। सतुआ बाबा ने संदेश दिया है कि सनातन से जुड़िए। सनातन से नहीं जुड़ेंगे तो अंतिम यात्रा से जुड़ना पड़ेगा। मैं उनके संदेश को बढ़ा रहा हूं।
बाबा माघ मेला की सुर्खियों में बने हुए हैं। शाही लाइफ स्टाइल को अक्सर वो इंज्वाय करते दिखते हैं। 14 जनवरी को 3 करोड़ की लैंड रोवर डिफेंडर छोड़कर स्पोर्ट्स कार पोर्शे टर्बाे 911 ले ली है, इस कार की कीमत करीब 4.40 करोड़ बताई जा रही है।
सतुआ बाबा कहते हैं- मुझे इनका शौक नहीं, सिर्फ इतना पता है कि इनमें बैठूंगा, तो ये मुझे काशी, प्रयागराज, अयोध्या पहुंचा देंगी। ये सनातन की रफ्तार है। सनातन को बांटने वाले, जो राम पर गोलियां चलाने वाले हैं, उनको इन्हीं गाड़ियों की रफ्तार से रौंद दिया जाएगा।
योगी मंच से सतुआ बाबा से जुड़ने के संदेश देते हैं, इस पर वह कहते हैं- उन्होंने मेरे लिए नहीं, संन्यासी स्वरूप के लिए कहा। पीले रंग के कुर्ते-धोती में बेहद सामान्य दिखने वाले सतुआ बाबा के आश्रम में पॉलिटिकल और ब्यूरोक्रेसी की हस्तियों का ताता लगा रहता है, वो सबसे मिलते भी हैं, मगर सबसे ज्यादा ध्यान आश्रम में रहने वाले कल्पवासियों का रख रहे हैं। सतुआ बाबा कल भी थे, आज भी हैं, हर कुंभ और माघ मेले में रहते हैं। व्यक्ति की सोच अलग-अलग है, मैं अध्यात्म के सबसे बड़े मेले में हूं, जिसे माघ मेला कहते हैं। मुझे लगता है कि यहां हर चीज से जुड़ाव होना चाहिए। हमारा भारत तो यही सिखाता है। न मुझे शौक है, न मुझे इन गाड़ियों की खूबियों का कुछ पता है। मुझे तो सिर्फ गाड़ी में चलने का पता है। काशी से बैठूंगा तो प्रयागराज आ जाऊंगा। यहां से बैठूंगा तो अयोध्या चला जाऊंगा, इसके सिवा कुछ नहीं। हमारा तो मकसद सिर्फ पड़ाव तक पहुंचने का है। मुझे इन गाड़ियों के नाम नहीं पता हैं, ये भी नहीं पता कि कितने की आती हैं? उसके लिए गूगल बाबा हैं।
क्या अध्यात्म इन गाड़ियों में नहीं चल सकता है? क्या सनातन को मानने वाला इन गाड़ियों में बैठ नहीं सकता है? ये सनातन की रफ्तार है, सनातन को बांटने, दबाने के लिए जो लोग प्रयास कर रहे थे, जो राम पर गोलियां चलाने वाले हैं, उनको इन्हीं गाड़ियों की रफ्तार से रौंद दिया जाएगा।
क्या भारत का सनातन इतना कमजोर है...गाड़ियों में बैठने से कोई गलत समझेगा। भारत में लोकतंत्र है, जिसको जो समझना है, वो समझे। मेरे लिए जेसीबी, बुलेट, ठेला, जीप, डिफेंडर और फरारी भी महंगा है। ये हमारा विषय नहीं है, हमें तो सिर्फ अपने पड़ाव तक पहुंचकर सनातन की ध्वजा को आगे बढ़ाना है।
मैं अध्यात्म में हूं, जो सनातन से जुड़ेगा, वो भारत का होगा। जो नहीं जुड़ेगा, भारत को जातियों में तोड़ने का काम करेगा। उसको तो मणिकर्णिका घाट ही जाना पड़ेगा। क्योंकि उस घाट पर मेरा आश्रम है। वहीं पर अंतिम संस्कार होता है। जो भारत से नहीं जुड़ेगा, उसका तो रामनाम सत्य ही होगा।
व्यक्तिगत मेरे लिए नहीं, बल्कि मेरे संन्यासी स्वरूप के लिए कहा गया था। सबकी अपनी-अपनी सोच है।
माघ मेला में श्रद्धालुओं का आगमन रहता है, श्रद्धा भक्ति के साथ जो यहां आ रहे हैं, एक संत होने के नाते कर्तव्य है कि उन्हें आश्रय दिया जाए। यही काम हम यहां पर कर रहे हैं। इतना कहना चाहता हूं कि जिन्होंने अंधकार में गरीब की कुटिया में लाइट नहीं दी। जिन्होंने भूखे को भोजन नहीं दिया। जिन्होंने रोड पर रफ्तार नहीं दी थी। अब ये प्रधानमंत्री मोदी और योगीजी का भारत है, यहां सब कुछ अच्छा होगा। विकास की रफ्तार तेज होगी।
श्रद्धा-भक्ति के साथ यहां आए, त्रिवेणी संगम पर स्नान करें। अपने परिवार और समाज को एक करें। माघ मेला ही नहीं, पूरा भारत ही विश्व में चर्चा में आ गया है। 500 सालों के बाद राम अयोध्या पहुंच सके। भारत में प्रकाशमय सूर्य खिल चुका है। आपने देखा होगा कि महाकुंभ में 75 करोड़ लोगों ने इसी त्रिवेणी में स्नान किया था।
