अवैध हिरासत मामले में हाइकोर्ट ने दी सजा, पुलिसकर्मियों को कोर्ट में खड़ा कराया
प्रयागराज (राजेश सिंह)। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अवैध हिरासत और न्यायिक आदेशों की अवहेलना पर नाराजगी जताते हुए दोषी पुलिस कर्मियों को कोर्ट उठने तक हिरासत की सजा दी।
कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के आदेशों की अनदेखी कानून के शासन पर सीधा प्रहार है और इसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि न्यायिक संस्थाओं का सम्मान हर सरकारी अधिकारी की संवैधानिक जिम्मेदारी है। यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ ने सानू उर्फ राशिद की जमानत अर्जी पर दिया।
मामला ललितपुर जिले का है। सानू उर्फ राशिद जमानत के हाईकोर्ट में अर्जी दायर की थी। इस दौरान सानू के परिजनों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उसे 14 सितंबर को हिरासत में लिया, लेकिन आधिकारिक गिरफ्तारी 17 सितंबर को दिखाई गई। इस दौरान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा कई बार सीसीटीवी फुटेज पेश करने का आदेश दिया गया, परंतु थाना कोतवाली पुलिस फुटेज उपलब्ध नहीं करा सकी। पुलिस का तर्क था कि कैमरों की स्टोरेज क्षमता सीमित होने के कारण रिकॉर्डिंग स्वतः डिलीट हो गई।
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि थाना प्रभारी और विवेचक ने न्यायिक आदेशों की जानबूझकर अवहेलना की। अदालत ने दोनों अधिकारियों को “कोर्ट उठने तक” हिरासत में रखने की सजा सुनाई। साथ ही राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि पीड़ित को अवैध हिरासत के लिए एक लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए, जिसकी वसूली संबंधित अधिकारियों के वेतन से की जा सकती है। वहीं कोर्ट ने आवेदक को सशर्त जमानत देते हुए कहा कि वह बजाज फाइनेंस लिमिटेड को 15 लाख रुपये लौटाने का वचन देगा और अन्य कानूनी शर्तों का पालन करेगा।
इसके साथ ही कोर्ट पुलिस थानों में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कई निर्देश जारी किए। कहा कि अब जिला न्यायिक अधिकारी औचक निरीक्षण कर सकेंगे और सीसीटीवी फुटेज को कम से कम छह महीने तक सुरक्षित रखना अनिवार्य होगा। साथ ही, हिरासत में हिंसा या अवैध बंदी से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए जिला स्तर पर मानवाधिकार न्यायालय स्थापित करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
