विश्वविद्यालय के पत्राचार संस्थान की निदेशक की याचिका खारिज
प्रयागराज (राजेश सिंह)। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि कोई विशिष्ट सेवा नियमावली अथवा वैधानिक प्रावधान नहीं है तो स्व-वित्तपोषित संस्थानों के कर्मचारी सेवानिवृत्ति लाभ पाने के हकदार नहीं हैं।
कोर्ट ने संस्थान के निदेशक की इस मांग को अस्वीकार कर दिया कि कुछ लोगों को परिलाभ का भुगतान किया गया है,उसे भी दिलाया जाय। कोर्ट ने कहा सेवानिवृत्ति परिलाभ देने का नियम नहीं तो नकारात्मक समानता की मांग नहीं की जा सकती।
सेवानिवृत्ति लाभ पेंशन, ग्रेच्युटी की मांग थी
न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकलपीठ ने रेखा सिंह की वह याचिका खारिज कर दी है, जिसमें सेवानिवृत्ति लाभ जैसे पेंशन तथा ग्रेच्युटी की मांग की गई थी। कोर्ट ने कहा, पेंशन और ग्रेच्युटी का दावा करने के लिए विशिष्ट नियमों या वैधानिक प्रविधानों का होना आवश्यक है। अगर ऐसा कोई प्रावधान नहीं है तो कर्मचारी सेवानिवृत्ति लाभ का दावा नहीं कर सकता, भले ही संस्थान इलाहाबाद विश्वविद्यालय का अभिन्न अंग हो।
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी
याची इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ कॉरेस्पॉन्डेंस कोर्सेज एंड कंटिन्यूइंग एजुकेशन में असिस्टेंट डायरेक्टर/डायरेक्टर पद से सेवानिवृत्त हैं। उन्होंने पहले 2016 में याचिका दायर कर नवंबर 2014 से बकाए वेतन का भुगतान करने के लिए विश्वविद्यालय को निर्देश देने की मांग की थी। उनकी याचिका स्वीकार करते हुए कोर्ट ने 13 अप्रैल 2018 को कहा कि नवंबर 2014 से 2017 में सेवानिवृत्ति तक वेतन का भुगतान किया जाए। उक्त आदेश को इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका भी सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2019 में खारिज कर दी।
अगस्त 2017 में सेवानिवृत्ति उपरांत बकाया भुगतान के लिए फिर याचिका दायर की। इसका निस्तारण 27 अक्टूबर 2018 के इस आदेश से किया गया कि विधि के अनुसार विचार किया जाए। इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने 30 मई 2019 के आदेश से सेवानिवृत्ति लाभों जैसे पेंशन आदि के दावे को इस आधार पर खारिज कर दिया कि संबंधित संस्थान स्व-वित्तपोषित है और वेतन और अन्य भत्तों का भुगतान संस्थान की आय पर निर्भर करता है, यानी छात्रों से फीस के संग्रह पर। इस आदेश को याची ने फिर हाईकोर्ट में चुनौती दी।
नियम या अध्यादेश नहीं दिखा दिखा सके
अधिवक्ताओं ने कहा कि इसमें कोई विवाद नहीं है कि संबंधित संस्थान स्व-वित्तपोषित है। हालांकि इसकी स्थिति हमेशा विश्वविद्यालय के अभिन्न अंग के रूप में मानी जाती थी। जब 2005 में विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिला तो याची की सेवा की प्रकृति विश्वविद्यालय अधिनियम, 2005 की धारा 5(डी) के तहत संरक्षित की गई। इसके अनुसार पेंशन, अवकाश, ग्रेच्युटी, भविष्य निधि और अन्य मामलों में समान अधिकार और विशेषाधिकार मिलना था।
अधिनियम, 2005 की धारा 37 के अनुसार याची पेंशन की हकदार है। विश्वविद्यालय की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष गोयल ने कहा कि संबंधित संस्थान की प्रकृति हमेशा अस्थायी थी और अधिनियम, 2005 के तहत भी इसकी अस्थायी स्थिति जारी रही। दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा, सेवानिवृत्ति लाभ तभी दिए जा सकते हैं जब नियम इसकी अनुमति देते हों।
याची ऐसा कोई नियम या अध्यादेश नहीं दिखा सकी। सिर्फ इसलिए कि संस्थान विश्वविद्यालय का अभिन्न अंग है अथवा अन्य को लाभ दिए गए हैं, यह नहीं कहा जा सकता है कि याची सेवानिवृत्ति लाभों की हकदार है। कोर्ट ने याची के इस तर्क को भी नहीं माना कि संस्थान के कुछ कर्मचारियों को ऐसा लाभ दिया गया है। कहा, जब याची दावे के समर्थन में कोई प्रविधान नहीं दिखा पा रहा है तो नकारात्मक समानता का कोई सवाल नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा, अगर किसी एक या समूह को बिना कानूनी आधार अथवा न्याय के कोई लाभ या फायदा दिया गया है, तो वह लाभ गुणा नहीं हो सकता अथवा समानता के सिद्धांत के रूप में इसका संदर्भ नहीं दिया जा सकता । बसावराज बनाम स्पेशल लैंड एक्विजिशन ऑफिसर के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह स्थापित कानूनी सिद्धांत है कि संविधान का अनुच्छेद 14 अन्याय या धोखाधड़ी को बढ़ावा देने के लिए नहीं है, भले ही अन्य मामलों में गलत निर्णय दिए गए हों।
अगर कुछ अन्य समान स्थितियों वाले व्यक्तियों को अनजाने में या गलती से कोई राहत दी गई है तो ऐसा आदेश दूसरों को भी वही राहत पाने का कानूनी अधिकार नहीं देता।