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महिलाओं के योगदान को मिलती पहचान, गरिमापूर्ण रोजगार के नए अवसर हो रहे सृजित

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यह लेख भारत की विकास यात्रा में महिलाओं की केंद्रीय भूमिका, विशेषकर श्देखभाल अर्थव्यवस्थाश् के माध्यम से, पर प्रकाश डालता है। मोदी सरकार इस अदृश्य श्रम को मान्यता और पेशेवर स्वरूप दे रही है, जिससे महिला श्रम शक्ति भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है (23.3ः से 41.7ः)...

देश आठ मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है। भारत की विकास यात्रा में महिलाओं की भूमिका परिधि में नहीं, बल्कि केंद्र में रही है। आज समाज की हर दृश्यमान उपलब्धि के पीछे महिला संचालित एक आधारशक्ति अनवरत कार्य कर रही है, जिसका नाम है-देखभाल की अर्थव्यवस्था यानी केयर इकोनमी। यह वह मौन ऊर्जा है, जो भारत के अस्तित्व को हर पल संबल प्रदान करती है।

यह उस मां का समर्पण है, जो सूर्याेदय से पूर्व अपनों के लिए भोजन पकाती है और फिर जीविका की चुनौतियों की ओर निकल पड़ती है। यह उस पत्नी की अटूट निष्ठा है, जो कठिन से कठिन समय में भी परिवार की नींव को दरकने नहीं देती। यह उस बेटी का निःस्वार्थ भाव है, जो दिन भर की थकान के बाद भी रात के पहर अपने माता-पिता के सिरहाने बैठती है। यह शक्ति किसी यश या प्रशंसा की आकांक्षी नहीं है। वह तो बस कर्तव्य की उस अविरल धारा की तरह है, जो बिना शोर मचाए सृजन करती रहती है।

ऐतिहासिक रूप से महिलाओं के योगदान का एक विशाल हिस्सा विशेषकर अवैतनिक देखभाल, अनौपचारिक श्रम और सामुदायिक सेवा पारंपरिक आर्थिक गणनाओं की परिधि से बाहर रहा है। इसे देखते हुए मोदी सरकार ने देखभाल के इस अदृश्य पहलू को कम करने, उसे सामाजिक मान्यता देने और उसके न्यायसंगत पुनर्वितरण पर बल दिया है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में महिलाओं को केवल लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि विकास के अग्रदूत के रूप में मान्यता दी गई है। महिला नेतृत्व वाला विकास आज एक सशक्त नीतिगत दृष्टि है, जो बजट, कार्यक्रमों और संस्थागत सुधारों में परिलक्षित होती है।

सरकार का दृष्टिकोण देखभाल से जुड़ी सेवाओं को पेशेवर स्वरूप प्रदान कर उन्हें समावेशी विकास के एक नए इंजन के रूप में रूपांतरित करना है। यही कारण है कि हाल में भारत में महिला श्रम शक्ति सहभागिता दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो 2017-18 में 23.3 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में 41.7 प्रतिशत हो गई है। यह आंकड़ा भारतीय महिलाओं की बढ़ती आकांक्षाओं और आर्थिक गतिविधियों में उनके बढ़ते प्रभुत्व का सूचक है। सवैतनिक कार्यों में महिलाओं की यह भागीदारी न केवल घरेलू समृद्धि का आधार बन रही है, बल्कि राष्ट्रीय उत्पादकता को भी नई ऊंचाइयों पर ले जा रही है।

आर्थिक सर्वेक्षण इस वास्तविकता को रेखांकित करता है कि यदि हम अवैतनिक देखभाल के बोझ को कम कर सकें और इन सेवाओं को एक व्यावसायिक स्वरूप प्रदान करें तो महिला रोजगार के परिदृश्य में एक क्रांतिकारी बदलाव आएगा। भारतीय केयर इकोनमी वर्तमान में लाखों लोगों की आजीविका का संबल है और आने वाले दशक में इसमें रोजगार सृजन की अपार संभावनाएं हैं। यही कारण है कि केंद्रीय बजट 2026-27 में केयर इकोनमी को सुदृढ़ करने पर विशेष बल दिया गया है।

महिलाओं के नेतृत्व में विकास के प्रति सरकार की अटूट प्रतिबद्धता ऐतिहासिक जेंडर बजट में स्पष्ट झलकती है, जिसका आवंटन अब तक के उच्चतम स्तर पांच लाख करोड़ रुपये से अधिक पर पहुंच गया है। मोदी सरकार 1.5 लाख देखभालकर्ताओं के कौशल विकास में भी निवेश कर रही है, कामकाजी महिला छात्रावासों का विस्तार कर रही है और आंगनबाड़ी केंद्रों को आधुनिक बनाकर प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल सुनिश्चित कर रही है। इसके साथ ही स्वास्थ्य एवं पोषण प्रणालियों के समन्वय को भी सशक्त किया जा रहा है। ये सभी प्रयास एक स्पष्ट राजनीतिक और नैतिक प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं कि जब महिलाओं को आवश्यक सहयोग और मंच मिलता है तो संपूर्ण अर्थव्यवस्था की गति तीव्र हो जाती है।

सामाजिक सुरक्षा संहिता और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य स्थिति संहिता जैसे वैधानिक ढांचे शिशु देखभाल केंद्रों और श्रमिक कल्याण के प्रविधानों को सुदृढ़ करते हैं। ये सुधार एक गहरे सिद्धांत को प्रतिपादित करते हैं कि शिशु देखभाल सहायता कोई सुविधा मात्र नहीं, बल्कि आर्थिक न्याय का एक अनिवार्य संरचनात्मक आधार है। मोदी सरकार महिलाओं और बच्चों को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के केंद्र में रखती है, जो देश की कुल जनसंख्या का 65 प्रतिशत से अधिक हिस्सा हैं। उनका सर्वांगीण कल्याण एक अनिवार्य रणनीतिक आवश्यकता है। 2050 तक वरिष्ठ नागरिकों की संख्या में बढ़ोतरी होगी।

इससे परिवार के भीतर भी देखभाल से जुड़ी जिम्मेदारियां बढ़ेंगी। साथ ही करोड़ों बच्चों को व्यवस्थित प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा, सुदृढ़ पोषण और स्वास्थ्य सहायता की नितांत आवश्यकता होगी। आज तेजी से होते शहरीकरण, प्रवासन और एकल परिवारों के बढ़ते चलन ने हमारी पारंपरिक सामाजिक सहायता प्रणालियों को बदल दिया है। अनौपचारिक ढांचों पर बढ़ते दबाव के कारण अब सुलभ, किफायती और गुणवत्तापूर्ण शिशु देखभाल एवं पारिवारिक सेवाओं की आवश्यकता अनिवार्य होती जा रही है। संगठित और सामुदायिक सेवाओं की यह मांग केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि द्वितीय एवं तृतीय श्रेणी के शहरों और ग्रामीण जनपदों में भी तीव्रता से उभरेगी।

देखभाल की अर्थव्यवस्था में निवेश एक साथ कई राष्ट्रीय लक्ष्यों को मजबूत करता है। इससे महिला श्रमशक्ति की भागीदारी बढ़ती है, बाल विकास के परिणाम सुधरते हैं, बुजुर्गों का कल्याण सुनिश्चित होता है और गरिमापूर्ण रोजगार के नए अवसर सृजित होते हैं। देखभाल प्रणालियों के संस्थागत और पेशेवर होने से महिलाएं सशक्त होती हैं, परिवारों को स्थिरता मिलती है और संपूर्ण अर्थव्यवस्था को गति प्राप्त होती है।

जैसे-जैसे भारत अमृतकाल से विकसित भारत की ओर बढ़ रहा है, यह स्पष्ट होता जा रहा है कि सामाजिक बुनियाद को सुदृढ़ किए बिना विकास को टिकाऊ नहीं बनाया जा सकता और केयर इकोनमी ही वह अनिवार्य आधार है। लिहाजा इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हम देखभाल के अदृश्य श्रम को सम्मान देने और उसे संस्थागत रूप से सशक्त करने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हैं।

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