नीतीश कुमार के राज्यसभा नामांकन के साथ बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में उनकी दो दशक लंबी पारी समाप्त होने की चर्चा है। यह बदलाव पिछले साल विधानसभा चुनाव के समय ही तय हो गया था। भाजपा अब बिहार में अपना पहला मुख्यमंत्री बनाने की तैयारी में है, जिसमें सम्राट चौधरी जैसे नाम चर्चा में हैं...
जब पूरा देश होली में व्यस्त था, तब मीडिया में राज्यसभा सदस्यता के जरिये पुत्र निशांत के राजनीतिक आगाज की चर्चा चल रही थी, पर होली का खुमार उतरते-उतरते साफ हो गया कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की दो दशक से भी लंबी पारी पर विराम लगने जा रहा है। नीतीश ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में पटना में राज्यसभा के लिए नामांकन कर दिया। यह साफ है कि इतने महत्वपूर्ण राज्य में अंजाम दिए गए सत्ता परिवर्तन की पटकथा रातों रात नहीं लिखी गई होगी।
शायद यह पटकथा पिछले साल नवंबर में विधानसभा चुनाव के समय ही लिख दी गई थी। इसलिए नहीं कि जद-यू की 85 सीटों के मुकाबले भाजपा 89 सीटें जीत गई थी। भाजपा सीटें तो 2020 में भी जद-यू से ज्यादा जीती थी, फिर भी उसने नीतीश को ही मुख्यमंत्री बनाया, क्योंकि तब उनके पास राजद के साथ मिल सरकार बनाने का विकल्प था। भाजपा से तनातनी के बीच नीतीश ने वह विकल्प आजमाया भी, पर विपक्षी गठबंधन का संयोजक न बनाए जाने पर 2024 के शुरू में वे राजग में वापस लौट आए।
2025 के विधानसभा चुनाव में जद-यू की सीटें तो 43 से बढ़ कर 85 हो गईं, पर राजद और कांग्रेस की करारी हार के बाद नीतीश के पास कोई विकल्प नहीं बचा। दरअसल सहयोगी चिराग पासवान की लोजपा, जीतनराम मांझी की हम और उपेंद्र कुशवाहा के रालोमो की मिली सीटों की बदौलत भाजपा विपक्ष में मामूली तोड़फोड़ के जरिये पिछले साल ही बिहार में अपने पहले मुख्यमंत्री की ताजपोशी कर सकती थी, पर उसने नीतीश को सम्मानजनक विदाई का आफर दिया।
शायद उसी के तहत नीतीश राज्यसभा जा रहे हैं। संभव है राज्यसभा सदस्य के रूप में नीतीश कुमार को केंद्र सरकार में कोई महत्वपूर्ण मंत्रालय मिल जाए। जद-यू द्वारा हरिवंश को तीसरी बार राज्यसभा न भेजने से वहां उप सभापति पद भी रिक्त होने जा रहा है, पर स्वास्थ्य संबंधी चर्चाओं के मद्देनजर नीतीश कुमार शायद ही वह जिम्मेदारी लें। जो भी हो, बिहार में पहले भाजपाई मुख्यमंत्री की ताजपोशी का रास्ता साफ दिख रहा है।
राज्यसभा चुनाव 16 मार्च को होगा। नीतीश मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद ही देंगे, पर भाजपा में नया मुख्यमंत्री चुनने पर चर्चा शुरू हो चुकी है। नीतीश सरकार में भाजपा कोटे के उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी समेत कई नाम चर्चा में हैं। अतीत का अनुभव बताता है कि पद की दौड़ में शामिल बताए जाने वाले नाम जीत के पोडियम तक कम ही पहुंच पाते हैं। देवेंद्र फडणवीस अपवाद हैं।
जाति से प्रभावित बिहार की राजनीति में अपने पहले मुख्यमंत्री का चयन भाजपा के लिए आसान नहीं होगा, पर अपनी ही शैली में ऐसी चुनौतियों से पार पाते हुए हमने उसे कई बार देखा है। देखना यह होगा कि भाजपा अपने परंपरागत जनाधार वर्गों में से किसी पर दांव लगाती है या फिर जनाधार के विस्तार के लिए किसी नए वर्ग के चेहरे को चुनती है। नई सरकार में उप मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार के पुत्र निशांत की ताजपोशी भी संभव है।
ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि लालू के विरुद्ध परिवारवाद को बड़ा मुद्दा बनाने वाले नीतीश पुत्रवाद को कैसे जायज ठहराएंगे? बेशक निशांत के साथ एक और उप मुख्यमंत्री बनाकर सामाजिक समीकरण साधने की सुविधा भाजपा के पास रहेगी, बशर्ते 19 विधायकों वाले चिराग पासवान भी उस पद के लिए न अड़ जाएं। वैसे चिराग को पहले ही साधना होगा। यदि लोजपा के वोट नहीं मिले तो उपेंद्र कुशवाहा का राज्यसभा के लिए चुना जाना मुश्किल होगा।
यह देखना होगा कि भाजपा के लिए बिहार में अपना पहला मुख्यमंत्री बना लेना ज्यादा चुनौतीपूर्ण रहेगा या उसके बाद की राजनीति? जद-यू की सीटों में अप्रत्याशित उछाल ने बिहार का राजनीतिक समीकरण बहुत उलझा दिया है। जद-यू नीतीश के करिश्माई नेतृत्व को इसका श्रेय देना चाहता है, पर उन्हीं के नेतृत्व में पार्टी 2020 में मात्र 43 सीटों पर सिमट गई थी। जब-तब विवादास्पद टिप्पणियों से इतर उनकी छवि साफ-सुथरे नेता और ‘सुशासन बाबू’ की ही रही है, पर अब जबकि वे संसद के दोनों सदनों की सदस्यता की अपनी ‘पुरानी इच्छा’ पूरी करने के लिए मुख्यमंत्री पद छोड़ रहे हैं, तब प्रश्न यह है कि बिहार में उनके साथ पिछले ढ़ाई-तीन दशक में जुड़ा जनाधार आगामी चुनावों में किधर जाएगा?
पटना में मुख्यमंत्री आवास और जद-यू कार्यालय में जैसा माहौल दिखा तथा भाजपा से निकटता वाले अपने ही दल के नेताओं ललन सिंह, विजय चौधरी और संजय झा के विरुद्ध जैसी नारेबाजी हुई, उससे आंतरिक असहजता का ही संदेश मिलता है। इन नेताओं पर भाजपा से मिलीभगत कर ‘अस्वस्थ’ नीतीश को ‘हाईजैक’ करने के तेजस्वी यादव के आरोपों को राजनीति प्रेरित शरारत मान लें तो भी जद-यू के अंदर से मुखर प्रतिक्रियाएं दल के जनाधार के भविष्य के प्रति सवाल पैदा करती हैं।
बिहार में अपना पहला मुख्यमंत्री बनाने जा रही भाजपा हरगिज नहीं चाहेगी कि 2030 में उसे सरकार बनाने के लिए बैसाखियों की जरूरत पड़े। यह तब संभव हो पाएगा, जब जद-यू के जनाधार का बड़ा हिस्सा उसके पाले में आ जाए। अगर जद-यू के जनाधार का बड़ा हिस्सा ‘सामाजिक न्याय’ के नाम पर राजद की ओर गया तो उसे मिलने वाली संजीवनी भाजपा की चुनावी चुनौतियां और बढ़ाएगी।