प्रयागराज (राजेश सिंह)। क्या उत्तर प्रदेश के मुखिया योगी आदित्यनाथ के ‘जीरो टॉलरेंस’ और ‘सख्त कानून-व्यवस्था’ के दावों को शंकरगढ़ के राखड़ (Fly Ash) माफिया ठेंगा दिखा रहे हैं? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि शंकरगढ़ के लखनपुर और आसपास के दर्जनों गांवों में इन दिनों विकास की नहीं, बल्कि ‘मौत की इबारत’ लिखी जा रही है। रात 7 बजते ही जब पूरा इलाका सोने की तैयारी करता है, तब इन गांवों में शुरू होता है खूनी डंपरों का तांडव, जो सुबह होते-होते ग्रामीणों के फेफड़ों में ज़हर की तरह समा जाता है।
आधी रात का खेल: तिरपाल गायब, नियम हवा, सिर्फ नोटों की खनक!
नियमों के मुताबिक फ्लाई ऐश को बंद कंटेनरों या पूरी तरह गीला करके, तिरपाल से ढककर तयशुदा डंपिंग यार्ड में ही गिराया जा सकता है। लेकिन शंकरगढ़ में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) के नियम सिर्फ कागजों पर ही दफन हैं।
खुलेआम हो रहा नियमों का उल्लंघन
दर्जनों ओवरलोड डंपर बिना तिरपाल के, सूखी राखड़ को खेतों, रिहायशी इलाकों और कच्चे रास्तों पर सरेआम फेंक रहे हैं।
राखड़ माफिया रात के अंधेरे का उठाते हैं फायदा
रात 7 बजे के बाद यह खेल इसलिए खेला जाता है ताकि अधिकारियों की जेबें गर्म रहें और जनता सोती रहे। सुबह होते ही पूरा लखनपुर गांव सफेद ज़हरीली धूल की चादर में लिपट जाता है। घरों के अंदर, खाने की थाली में और बच्चों के दूध के गिलास तक में यह ज़हर तैरता हुआ दिखाई देता है।
फेफड़ों में जम रहा 'कैंसर': दम तोड़ रही हैं सांसें
यह सिर्फ धूल नहीं है, यह धीमा ज़हर (Slow Poison) है। विशेषज्ञों के अनुसार, फ्लाई ऐश में मौजूद सिलिका, आर्सेनिक और लेड जैसे भारी तत्व सीधे फेफड़ों पर हमला करते हैं।
"गाँव में दमा, एलर्जी, आंखों में जलन और टीबी के मरीजों की बाढ़ आ गई है। अगर यही हाल रहा तो शंकरगढ़ का लखनपुर बहुत जल्द 'सिलिकोसिस और कैंसर' का हब बन जाएगा। बच्चे और बुजुर्ग रात भर खांसते हैं, लेकिन उनकी चीखें अधिकारियों के एयरकंडीशन्ड कमरों तक नहीं पहुंच पा रही हैं।"
आक्रोशित ग्रामीण का कहना
सिर्फ इंसान ही नहीं, बल्कि खेतों की मिट्टी बंजर हो रही है, जलस्रोत ज़हरीले हो चुके हैं और चारा चरने वाले मवेशी बीमार होकर दम तोड़ रहे हैं। यह एक पूरी नस्ल को अपाहिज बनाने की साज़िश है।
डीएम प्रयागराज और एसडीएम बारा की 'रहस्यमयी चुप्पी' पर उठते सवाल
ग्रामीणों ने इस नरक से मुक्ति के लिए एसडीएम बारा से लेकर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और जिलाधिकारी (DM) प्रयागराज तक के दरवाजे खटखटाए, लेकिन नतीजा? शून्य! प्रशासन की इस रहस्यमयी चुप्पी पर अब जनता सीधे सवाल उठा रही है:
आखिर किसके दबाव या संरक्षण में ये राखड़ सप्लायर इतने बेखौफ हैं?
क्या रात के अंधेरे में डंपरों को गुजारने के लिए स्थानीय पुलिस और आरटीओ विभाग अपनी आंखें बंद कर लेता है?
क्या प्रशासन किसी बड़ी जनहानि या ग्रामीणों के उग्र आंदोलन का इंतजार कर रहा है?
अब आर-पार की लड़ाई: ग्रामीणों की दो टूक मांगें
अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। शंकरगढ़ की जनता ने साफ कर दिया है कि अगर निम्नलिखित मांगों पर 48 घंटे के भीतर कार्रवाई नहीं हुई, तो वे सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे:
तत्काल कार्यवाही एवं जब्ती
रात में अवैध रूप से राख गिराने वाले डंपरों को तुरंत सीज किया जाए और सप्लायरों पर रासुका (NSA) व महामारी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज हो। प्रभावित गांवों में तुरंत सरकारी डॉक्टरों की टीम भेजकर मुफ्त जांच और दवाएं बांटी SDM जाएं।
सीसीटीवी लगाए जाने और गश्त बढ़ाए जाने की मांग
संवेदनशील रास्तों और सीक्रेट डंपिंग पॉइंट्स पर पुलिस की नाइट पेट्रोलिंग हो और सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं।
जुर्माना और रिकवरी: जिन सप्लायरों ने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है, उन पर करोड़ों का जुर्माना लगाकर उस राशि से गांवों का सुंदरीकरण और शुद्ध पेयजल की व्यवस्था हो।
माननीय जिलाधिकारी महोदय और उप जिलाधिकारी बारा, यह रिपोर्ट सिर्फ एक खबर नहीं है, बल्कि शंकरगढ़ की उस मरती हुई जनता की कराह है जिसने आपको अपना रक्षक चुना है। माफियाओं के इस ज़हरीले सिंडिकेट को तोड़िए, इससे पहले कि लखनपुर का आक्रोश प्रयागराज की सड़कों पर चक्काजाम का रूप ले ले। फैसला आपके हाथ में है - कानून का राज या माफिया का तांडव?
