प्रयागराज (राजेश सिंह)। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 133 के तहत लोक उपद्रव (न्यूसेंस) हटाने की कार्यवाही संक्षिप्त प्रकृति की होती है और कथित परेशानी से जुड़े आवेदन पर फैसला करने के लिए कोई भी भरोसेमंद साक्ष्य चाहिए न कि निर्णायक।
न्यायमूर्ति डा. अजय कुमार (द्वितीय) ने कुशीनगर के कप्तानगंज निवासी शंभू सिंह की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि इस धारा का इस्तेमाल किसी संपत्ति के मालिक के कीमती अधिकार को खत्म करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। मामले से जुड़े तथ्य यह हैं कि प्रतिवादी ओमप्रकाश ने धारा 133 के तहत आवेदन दायर कर मांग की कि याची द्वारा सार्वजनिक रास्ते से कथित अतिक्रमण हटाया जाए।
याची ने एसडीएम के सामने आपत्तियां पेश कीं। एसडीएम ने राजस्व निरीक्षक से रिपोर्ट मांगी और इसके आधार पर आदेश पारित कर याची को अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया। एसडीएम के आदेश के खिलाफ याची ने अपर सत्र/विशेष न्यायाधीश, पडरौना-कुशीनगर के समक्ष पुनरीक्षण याचिका प्रस्तुत की, जिसे खारिज कर दिया गया।
इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। याची ने कहा कि उसके तथा ओमप्रकाश की संपत्ति के बीच से गुजरे रास्ते का जनता द्वारा इस्तेमाल नहीं किया जाता था और मानसून में बारिश का पानी बहता था। उसने अतिक्रमण नहीं किया है।
म्युनिसिपल काउंसिल रतलाम बनाम वर्धिचंद और अन्य में सुप्रीम कोर्ट तथा वलीउद्दीन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा, जहां एक ओर सीपीआरपी की धारा 133 कार्यपालक मजिस्ट्रेट को सार्वजनिक रास्ते से अतिक्रमण या बाधा हटाने का आदेश देने का अधिकार देती है, वहीं उसे यह भी देखना चाहिए कि जिस व्यक्ति पर कानून का उल्लंघन करने का आरोप है क्या उसने अपने पक्ष को साबित करने के लिए कोई विश्वसनीय साक्ष्य पेश किया है।
राजस्व अधिकारियों की यह बात ध्यान में रखते हुए कि दो घरों के बीच रास्ते में सीढ़ी बनाई गई है, कोर्ट ने पाया कि याची ने सार्वजनिक रास्ते पर बाधा उत्पन्न की।
कहा, याची ने स्वयं ही रास्ते का अस्तित्व स्वीकार किया है। एक बार जब रास्ते के अस्तित्व और उससे होकर बारिश के पानी के बहने की बात स्वीकार कर ली जाती है तो फिर उस पर किसी भी प्रकार का अतिक्रमण नहीं हो सकता।
