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माघ मेला के ‘शब्द-ब्रह्म’ संगोष्ठी में विद्वानों का मंथन

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कल्पवास से जीवन प्रबंधन तक संवाद, साहित्य-संस्कृति का संगम

प्रयागराज (राजेश सिंह)। माघ मेले में उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र द्वारा श्शब्द-ब्रह्मश् संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी श्चलो मन गंगा-यमुना तीर र्यक्रम श्रृंखला का हिस्सा थी। रविवार को सांस्कृतिक केंद्र प्रेक्षागृह में आयोजित इस कार्यक्रम का शुभारंभ केंद्र निदेशक सुदेश शर्मा और अन्य वक्ताओं ने दीप प्रज्वलित कर किया।

मुख्य वक्ता डॉ. धनंजय चोपड़ा ने माघ मेले को लोक आस्था और जन विश्वास की जीवंत परंपरा का प्रतीक बताया। वे वरिष्ठ लेखक, चिंतक और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मीडिया अध्ययन केंद्र के कोर्स कोऑर्डिनेटर हैं।

डॉ. चोपड़ा ने कहा कि संगम की रेती केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का माध्यम भी है। उन्होंने कल्पवास को जीवन प्रबंधन की अनुपम पाठशाला बताया, जिस पर देश-विदेश के शोधार्थी अध्ययन करने प्रयागराज आते हैं।

डॉ. श्लेष गौतम ने माघ मेले और महाकुंभ को सांस्कृतिक, धार्मिक और लोक आस्था के महोत्सव के रूप में वर्णित किया। उन्होंने कहा कि इनके व्यापक महत्व को समझने के लिए इन्हें समग्र दृष्टि से देखना आवश्यक है।

डॉ. गौतम के अनुसार, कल्पवास और माघ मेला अब वैश्विक संवाद का विषय बन चुके हैं, क्योंकि भारत की ज्ञान, दर्शन और लोक परंपराएं विश्व को आकर्षित करती हैं। उन्होंने संगम की रेती पर बसे तंबुओं के संसार को एक जीवंत आध्यात्मिक लोक बताया।

‘शब्द-ब्रह्म’ साहित्य और संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में माघ मेलाश् विषय पर प्रो. राजेंद्र त्रिपाठी श्रसराजश् ने तीर्थराज प्रयाग के पौराणिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने ब्रह्मपुराण और स्कंद पुराण का उल्लेख करते हुए बताया कि माघ माह में सभी तीर्थों का समागम प्रयाग में होता है, जो लोक आस्था का मूल आधार है।

स्वागत उद्बोधन में सुदेश शर्मा ने कहा कि श्शब्द-ब्रह्मश् भारतीय संस्कृति की उस चेतना का प्रतीक है, जहाँ लोक आस्था, साहित्य और जीवन दर्शन का संवाद होता है। इस संगोष्ठी के दौरान एक मंत्रोच्चारण प्रतियोगिता भी आयोजित की गई, जिसमें सफल प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रमोद द्विवेदी ने किया, जबकि कार्यक्रम सलाहकार श्रीमती कल्पना सहाय ने धन्यवाद ज्ञापन दिया।


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