ईरान पर हमले के बाद भारत पर कितना पड़ेगा असर?
दिल्ली। अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर किए गए बड़े हमलों के बाद अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में भारी तेजी देखने को मिल सकती है। विश्लेषकों का अनुमान है कि होर्मुज जलडमरूमध्य बाधित होने पर ब्रेंट क्रूड 80-100 डालर प्रति बैरल या इससे भी ऊपर पहुंच सकता है।
यह स्थिति भारत के लिए बेहद चिंताजनक साबित हो सकती है। भारत अपनी कुल क्रूड जरूरत का लगभग 86-89 फीसद हिस्सा आयात करता है और भारत के कुल आयात का 45-50 फीसद अभी भी सउदी अरब, कुवैत, बहरीन, यूएई जैसे देशों से आता हैं, जिनकी आपूर्ति युद्ध के लंबा चलने से प्रभावित हो सकती है।
स्थिति पर भारत सरकार की नजर
भारत सरकार पूरी स्थिति पर नजर रखे हुए है और अगर जरूरी हुआ तो देश की ऊर्जा सुरक्षा को देखते हुए रूस से तेल की खरीद फिर से बढ़ाई जा सकती है। ईरान को लेकर राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की तरफ से लगातार की जा रही बयानबाजी का असर अंतरराष्ट्रीय क्रूड बाजार पर पहले से ही दिख रहा है।
एक दिन पहले (27 फरवरी) को ब्रेंट क्रूड की कीमत 72.87-73.19 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुई, जो जुलाई 2025 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। पूरे फरवरी में इसमें करीब 8 फीसद की बढ़ोतरी हो चुकी है। 28 फरवरी व 1 मार्च को बाजार बंद है लेकिन अगले हफ्ते को लेकर क्रूड बाजार में भारी अफरा-तफरी की आशंका है।
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान पर हमले की आशंका पहले से ही कीमतों को ऊपर धकेल रही थी और अगर युद्ध बढ़ा तो “वार प्रीमियम'' के कारण कीमतें और 15 फीसद तक उछल सकती हैं।कुछ एजेंसियों की रिपोर्ट के मुताबिक भारत फरवरी 2026 में रोजाना करीब 52 से 55 लाख बैरल क्रूड आयात किया है।
इनमें से लगभग 50 फीसद होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है, जो मुख्य रूप से सऊदी अरब, इराक, यूएई और कुवैत से आता है। युद्ध की विभीषका की वजह से इस पूरे मार्ग पर उल्टा असर पड़ने की आशंका है। भारत को इस बात की पहले से ही आशंका थी तभी वह खाड़ी क्षेत्र से आयात लगातार घटा रहा है।
पहले भारत 70 फीसद तक कच्चा तेल खाड़ी क्षेत्र से लेता था। लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद विविधीकरण की रणनीति अपनाई गई। रूस से आयात बढ़कर 35-40 फीसद तक पहुंच गया था, जो अब अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण घटकर 22-23 फीसद पर आ गया है।
केंद्र सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में की कटौती
रूस की पूरी हिस्सेदारी की भरपाई के लिए भारत ने सऊदी अरब, इराक और यूएई से खरीद बढ़ा दी है, जो खाड़ी क्षेत्र के हालात की वजह से प्रभावित हो सकती है।भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें पिछले तीन वर्षों से तकरीबन स्थिर रही हैं।
केंद्र सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में कटौती और तेल कंपनियों के मार्जिन प्रबंधन से कीमतों को नियंत्रित रखा है। अंतिम बार खुदरा कीमतों में बदलाव 14 मार्च, 2024 में किया गया था और पेट्रोल व डीजल की खुदरा कीमतों में दो रुपये प्रति लीटर की कमी की गई थी।
दिल्ली में पेट्रोल करीब 94.72 रुपये प्रति लीटर और डीजल 87.62 रुपये प्रति लीटर है। अगर अंतरराष्ट्रीय कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहीं तो ऐसी स्थिति नहीं रहेगी। सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है।
भारत पर असर
आयात बिल बढ़ेगा, रुपया कमजोर हो सकता है और महंगाई पर दबाव पड़ेगा। सरकारी सूत्रों का कहना है कि उनकी नजर पूरे हालात पर है। युद्ध बढ़ा तो रूस और अफ्रीकी स्त्रोतों से और अधिक खरीदारी तथा रिफाइनरियों को वैकल्पिक रूट्स पर स्विच करने की तैयारी की जा रही है।
