वकील के कहने पर एनबीडब्लू का निराधार आरोप लगाने पर एक लाख हर्जाना
प्रयागराज (राजेश सिंह)। इलाहाबाद हाइ कोर्ट ने ट्रायल जज पर बेहद गंभीर और निराधार आरोप लगाने वाले दो अभियुक्तों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। केस ट्रांसफर अर्जी खारिज करने के साथ - साथ ही उन पर एक लाख रुपये का हर्जाना भी लगाया है। न्यायमूर्ति समित गोपाल की एकलपीठ ने कहा यह दावा पूरी तरह आधारहीन और न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला है।
ट्रायल जज का अपठनीय आदेश देखने के बाद जज को हाईकोर्ट ने पठनीय आदेश लिखने की नसीहत दी और ज़िला जज से रिपोर्ट मांगी है।
अभियुक्तों का आरोप था कि ट्रायल कोर्ट ने शिकायतकर्ता (वादी मुकदमा) के भाई जो वकील हैं, उनके कहने पर गैर-जमानती वारंट (एनबीडब्ल्यू) जारी किया है।
कोर्ट ने कहा कि अपीलार्थी क्रमांक दो ओम प्रकाश ने अभिलेखों के अवलोकन के आधार पर शपथपूर्वक यह बात कही है जबकि अभिलेखों में ऐसा कोई भी साक्ष्य नहीं है जिससे आरोप की पुष्टि हो। मुकदमे से जुड़े तथ्य यह हैं कि श्याम सुंदर और ओम प्रकाश नामक अभियुक्तों ने झांसी स्थित अतिरिक्त सिविल जज (सीनियर डिवीजन) / अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित आपराधिक शिकायत को किसी अन्य अदालत में ट्रांसफर किए जाने की मांग को लेकर हाई कोर्ट का रुख किया था।
उनके खिलाफ झांसी के नवाबाद थाने में आइपीसी की विभिन्न धाराओं में केस दर्ज है। याचीगण ने कहा, शिकायतकर्ता का सगा भाई जो झांसी जिला अदालत में प्रैक्टिस करने वाला वकील है, उसने ट्रायल जज से उनके चौंबर में मुलाकात की और उसी के प्रभाव में नवंबर में उनके खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया गया। कोर्ट ने राज्य की ओर से दी गई इस दलील से भी सहमति जताई कि हलफनामे की सामग्री अवमाननापूर्ण प्रकृति की है।
कहा, ट्रायल कोर्ट द्वारा बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद अभियुक्तों ने डिस्चार्ज अर्जी दाखिल नहीं की और इसके स्थान पर ट्रांसफर याचिका दाखिल की। न्यायमूर्ति ने कहा, “मुकदमे की वर्तमान स्थिति डिस्चार्ज अर्जी दाखिल करने और आरोप तय किए जाने की है लेकिन अभियुक्तों ने आज तक डिस्चार्ज अर्जी दाखिल करना उचित नहीं समझा। कोर्ट ने यह चेतावनी भी दी है कि यदि राशि जमा नहीं की गई तो ट्रायल कोर्ट जिला मजिस्ट्रेट को निर्देश देगा कि इसे भू-राजस्व की तरह तत्काल वसूल किया जाए।
हर्जाना 10 दिनों के भीतर जिला विधिक सेवा समिति में जमा करना होगा। अपीलार्थी इसके बाद ट्रायल कोर्ट में रसीद जमा करेंगे। एकल पीठ ने ट्रायल कोर्ट के आदेश की लिखावट को लेकर भी गहरी नाराज़गी जताई। कहा, प्रस्तुत आदेश मात्र पांच पंक्तियों का है जिसमें तारीख और एनबीडब्ल्यू शब्द के अलावा कुछ भी पढ़ा नहीं जा सका। न्यायमूर्ति का कहना था कि यह कोर्ट न्यायिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर बार-बार निर्देश जारी कर चुका है कि ट्रायल कोर्ट आदेश स्पष्ट और पढ़ने योग्य तरीके से लिखें, लेकिन इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने बिना यह देखे कि आदेश पढ़ने योग्य है या नहीं, उस पर हस्ताक्षर कर दिए। डिस्ट्रिक्ट एवं सेशन जज झांसी को निर्देश दिया गया है कि वह यह सुनिश्चित करें कि संबंधित ट्रायल कोर्ट भविष्य में स्पष्ट और पठनीय आदेश पारित करे और इस संबंध में दो सप्ताह के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए।
