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मेजा में मोहर्रम की तैयारियां तेज, ताजिया निर्माण में जुटे कारीगर

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अकीदत भरे माहौल में कर्बला की साफ-सफाई पूरी, परंपरा को आगे बढ़ा रही नई पीढ़ी


मेजा, प्रयागराज (विमल पाण्डेय)। मोहर्रम के आगमन के साथ ही क्षेत्र में अकीदत और ग़म का माहौल गहराने लगा है। मेजा तहसील क्षेत्र के लोटाढ़ गांव में मुस्लिम समुदाय के लोग ताजिया निर्माण और कर्बला की साफ-सफाई में पूरे मनोयोग से जुटे हुए हैं।

गांव के चौक और छोटी नहर के पास स्थित कर्बला स्थल पर विशेष साफ-सफाई अभियान चलाया गया। ग्रामीणों ने मिलकर कर्बला परिसर को स्वच्छ किया और रास्तों को दुरुस्त किया, ताकि मोहर्रम के जुलूस के दौरान किसी प्रकार की परेशानी न हो।

गांव के मशहूर कारीगर मोहम्मद उस्ताद व मोहम्मद हुसनैन के नेतृत्व में ताजिया बनाने का कार्य तेजी से चल रहा है। यह परंपरा गांव में आजादी के बाद से निरंतर चली आ रही है। मोहम्मद उस्ताद के पूर्व उनके पिता स्वर्गीय सज्जाद हुसैन उर्फ गामा जी भी ताजिया बनाते थे। अब नई पीढ़ी इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। हुसैनिया कमेटी, लोटाढ़ वर्षों से पूरे आयोजन का संचालन करती आ रही है।

मोहर्रम शोक और मातम का महीना है, जिसे हज़रत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की शहादत की याद में मनाया जाता है। सन 61 हिजरी (680 ईस्वी) में इराक के कर्बला के मैदान में हक और इंसाफ के लिए लड़ते हुए उन्होंने अपनी जान कुर्बान कर दी थी। कर्बला की यही कुर्बानी आज भी लोगों को सच्चाई और न्याय के रास्ते पर चलने की प्रेरणा देती है।

मेजा क्षेत्र में मोहर्रम आपसी सौहार्द और भाईचारे का प्रतीक माना जाता है। ताजिया जुलूस के दौरान विभिन्न समुदायों के लोग भी सहयोग करते हैं। कर्बला में मातमी कार्यक्रमों के साथ इमाम हुसैन की शहादत को याद किया जाता है।

ताजिया निर्माण में मोहम्मद वसीम, मोहम्मद अजीम, मोहम्मद आरिफ, मोहम्मद सद्दाम उर्फ गोलू, मोहम्मद नाजीब उर्फ बबलू, मोहम्मद सरवर, मोहम्मद रोशन, मोहम्मद शहनवाज, मोहम्मद खालिक, सनवर अली, मेराज अली, मोहम्मद चांदबाबू, मोहम्मद श्यामुलहक, जब्बार अली, मोहम्मद शेबू, माशूक अली, मोहम्मद अरशद अली, मोहम्मद वहीद, महफूज अली (मुजावर), नूर आलम (मुजावर), मोहम्मद तोराब ‘अलमदार’, मोहम्मद रूखसाद, मोहम्मद मुस्तफा, मोहम्मद एकलाख, मोहम्मद कलीम, मोहम्मद मुकीम व मोहम्मद सैनूर सहित कई लोग सहयोग कर रहे हैं।

मोहर्रम की दसवीं तारीख को ताजिया जुलूस निकाला जाएगा। मेले के बाद ताजियों को कर्बला में सुपुर्द-ए-खाक किया जाता है। इस वर्ष मेला 26 जून, शुक्रवार को आयोजित होगा, जिसे लेकर गांव में तैयारियां जोरों पर हैं और लोगों में गहरी अकीदत व श्रद्धा का माहौल देखा जा रहा है।

मोहर्रम में ताजिया के लिए मिट्टी लाने की रस्म पांचवीं या सातवीं तारीख को पूरी की जाती है। इस दौरान अकीदतमंद ढोल-ताशों के साथ जुलूस निकालकर कर्बला या पवित्र स्थल से मिट्टी लाते हैं, जिसके बाद फातिहा व नियाज की जाती है।

परंपरा, आस्था और भाईचारे की मिसाल बना लोटाढ़


लोटाढ़ गांव में ताजिया निर्माण केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि आस्था और विरासत का प्रतीक बन चुका है। कारीगर मोहम्मद उस्ताद व मोहम्मद हुसनैन बताते हैं कि यह काम उनके परिवार में पीढ़ियों से चला आ रहा है। हर वर्ष पूरे गांव के लोग मिलकर ताजिया तैयार करते हैं, जिसमें कला के साथ गहरी श्रद्धा भी झलकती है।

ग्रामीणों का कहना है कि मोहर्रम के दौरान यहां का माहौल पूरी तरह संजीदा और अकीदत भरा हो जाता है। कर्बला की साफ-सफाई से लेकर जुलूस की व्यवस्था तक हर कार्य सामूहिक सहयोग से होता है। यही वजह है कि यह आयोजन क्षेत्र में सामाजिक एकता और भाईचारे की मजबूत मिसाल बना हुआ है।

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