नैनी, प्रयागराज (राजेश सिंह)। उत्तर प्रदेश सरकार भू-माफियाओं के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की नीति का ढिंढोरा पीट रही है, लेकिन नैनी क्षेत्र में प्रशासनिक मिलीभगत का एक ऐसा खेल सामने आया है जिसने कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ा रकर रख दी हैं। नैनी के एडीए कॉलोनी से मवैया गांव जाने वाले मुख्य मार्ग पर स्थित करोड़ों रुपये की सरकारी भूमि को रातों-रात निगलने की एक बड़ी पटकथा लिखी जा रही है, वह भी सीधे तहसील प्रशासन की नाक के नीचे।
अंधेरे का फायदा उठाकर चलीं जेसीबी, रातों-रात बदली जमीन की सूरत
मामला बंद पड़ी भारी उद्योग मंत्रालय की टीएसएल कंपनी की बाउंड्री से सटे नाले के किनारे का है। सूत्रों के मुताबिक, कथित भूमाफियाओं ने कानून को जेब में रखते हुए अंधेरे का फायदा उठाया। रातों-रात दर्जनों डंपर मिट्टी गिरवाकर जेसीबी मशीनों से चक्रव्यूह रचा गया और पूरी सरकारी जमीन का समतलीकरण (प्लेन) कर दिया गया। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस कीमती सरकारी भूखंड पर एक आलीशान व्यावसायिक बहुमंजिला इमारत खड़ी करने की पूरी तैयारी कर ली गई है।
लेखपाल की 'रहस्यमयी' रिपोर्ट और अराजी का खेल
इस पूरे खेल में सबसे बड़ा खलनायक क्षेत्रीय लेखपाल को बताया जा रहा है। प्रदर्शन कर रहे नागरिकों ने खुलकर आरोप लगाया कि क्षेत्रीय लेखपाल की कथित मिलीभगत से इस अवैध कब्जे को कानूनी जामा पहनाने की कोशिश हो रही है। लेखपाल ने अपनी रिपोर्ट में अराजी (खसरा) संख्या की सटीक लोकेशन छुपा ली और चालाकी से आरोपी का पक्ष लेते हुए इस सरकारी संपत्ति को निजी दिखाने का प्रयास किया। इसी धुंधली रिपोर्ट का फायदा उठाकर भूमाफिया इस अराजी से सटी पूरी सरकारी भूमि पर कब्ज़ा जमाने की फिराक में हैं।
जनता का फूटा गुस्सा, मिली 'शमशान' बनाने की धमकी
सोमवार को इस खुले भ्रष्टाचार के खिलाफ स्थानीय जनता का सब्र टूट गया। सैकड़ों ग्रामीणों ने सड़क पर उतरकर तहसील प्रशासन और भूमाफियाओं के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और विरोध प्रदर्शन किया। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि जब स्थानीय लोगों ने इस कब्ज़े को रोकने की कोशिश की, तो भूमाफियाओं ने सुधरने के बजाय उन्हें 'शमशान बनाने' (जान से मारने) जैसी खौफनाक धमकियां दीं। डराने-धमकाने के इस खुले खेल से इलाके में भारी तनाव का माहौल है।
यह कोई पहली बार नहीं है जब इस बेशकीमती जमीन पर डकैती डालने की कोशिश हुई हो। इतिहास गवाह है कि वर्ष 1997 में भी भूमाफियाओं ने इस जमीन को बेचने का जाल बुना था। लेकिन उस समय के तत्कालीन जांबाज तहसील प्रशासन ने तुरंत पैमाइश (नाप-जोख) कराकर इसे पूरी तरह सरकारी भूमि घोषित किया था और कब्ज़े की कोशिश को नाकाम कर दिया था। इस जमीन का सरकारी रिकॉर्ड और आराजी संख्या दर्शाने वाला आधिकारिक सरकारी नोटिस बोर्ड आज भी टीएसएल कंपनी के परिसर में सीना ताने खड़ा है।
अब देखना यह है कि मौजूदा जिला प्रशासन इस सरकारी बोर्ड का मान रखता है या फिर इन रसूखदार भूमाफियाओं के आगे घुटने टेक देता है। जनता अब मुख्यमंत्री के 'बुलडोज़र' इंसाफ का इंतजार कर रही है।
